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Showing posts from 2019

त्याग तपस्या की भूमि में

त्याग तपस्या की भूमि में, नित दीपक सा जलना होगा| राहें होंगी खरी खरी सी,  लैकिन पथ पर चलना होगा| मन को छोटा करने वाले, कुछ तो तरूओं से सीखो| मौन साधकर बहता नद है, यूँ  कष्टों   से  ना  चीखो| सह पाहन के आघातों को, ना नयन नदी के रोये हैं| भू ने बिजली के आघातों को, हँस कर खूब संजोये हैं| पाहन पाहन पद चापों से, राहें सृजन कर डालो| जो भी पथ में रोक रहा है, तुरत बिसर्जन कर डालो| दुर्गेश कुमार सराठे सजल

कभी याद तो कर ही लेना

गहरी नदी के गहरे तल में, या कि डूब गए दल दल में| पता नहीं है कहाँ छिपे हो, सब कुछ भूल गए पल दो पल में| पहले दिन में बात अलग थी, बहुत मुखौटेबाजी थी| सबके सब ही सभ्य बने थे, आओ हवा जब ताजी थी| लैकिन धीरे परदे टूटे, झुण्ड अचानक बन बैठे| बहुत बढ़ी यह गुटबाजी में, फिर आपस में ठन बैठे| कभी साथ में कोई रहा था, सबकुछ कैंसे याद रहेगा| बटे हुए ए गुट प्रधानों, मन में छोटा वाद रहेगा| साथ में लेकर क्या आये थे, क्या लेकर के जाना है| कभी याद तो कर ही लेना, सब कुछ तो रह जाना है| दुर्गेश कुमार सराठे सजल 

मन को तनिक सजग रखना

जीवन की यह डगर गजब है, यहाँ अकेला चलना होगा। साथ ना होंगे साथी सारे, एकलता  में  ढलना  होगा। छोड़ छाड़ दो सब बंधो को,  इन्हें गले का फंद ना मानो। नाते झूठे तोड़ो सारे, इन्हें प्रेम के छंद ना मानो। दीप जगत में तम में खोया, तम का वह प्रवाहक है। शीतलता में जलन बहुत है, ठण्डी ठण्डी सी पावक है। सजल तोड़ने वाला जग है, जरा संभल कर पग रखना। घात मिलेंगे स्व हाथों से, मन को तनिक सजग रखना। दुर्गेश कुमार सराठे "सजल" पुरैना कलाँ,बनखेड़ी,नर्मदापुरम्,म.प्र.,भारत

लैकिन उतने खोटे सब

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हृदय जब से सीख गया है, बातें बड़ी दबाना| तब से शोणित भूल गया है, दिल के दरबाजे पर आना| रह रह करके रोदन करता, लहू लहू पी पी जाता| जिसके ऊपर कर रखते हम, वह कंधा फिर ढह ही जाता| कद के ऊँचे लोग बहुत से, लैकिन मन से छोटे सब| बातों से बस लगते चोखे, लैकिन उतने खोटे सब|| दुर्गेश कुमार सराठे सजल

छोड़ निकलना धारों को

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नहीं किसी से कहना कुछ भी, करनी नहीं किसी से बात| हँसकर बोझ उठायेंगे, समय ने दी है जो सौगात| घात लगाये बैठे कुछ तो, कहीं कटारैं पैनी हैं| मुझे पता है कौन कहाँ है, नहीं किसी से कहनी है| नदी के संग में चलते जा, ओढ़ो नहीं किनारों को| अगर जरूरत पड़ जाये तो, छोड़ निकलना धारों को| दुर्गेश कुमार सराठे सजल 

नीर नयन पर लगता भारी

आज हृदय है फिर से सूना, तन्हाई है भारी भारी| कहने दुख को शब्द नहीं हैं, नीर नयन से बहना जारी| नहीं कोई अब अपना दिखता, दूरी सबने ठान रखी| जिन्हें हृदय से अपना माना, खड्ग उन्हीं ने तान रखी| नदी नीर से हुई नदारद, नीर नयन पर लगता भारी| फूल स्वयं ही तूटा ना था, उसकी कोमलता थी हत्यारी| दुर्गेश कुमार सराठे सजल 

ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया?

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बड़ी नदियाँ,बही नदियाँ| बढ़ी नदियाँ,धरा के जहन में गढ़ी नदियाँ| ए निर्लज्ज लोगों,बताओ कहाँ नदियाँ? ना उनमें रेत ओ बालू| हर घाट में उत्खनन चालू| ना बची हैं मीन भीतर, तटों पर दिखते नहीं कबूतर| टूट-टूट कर हो गई वह दरिया| ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया? दिखते नहीं हरे भरे से किनारे, चर गए हम लोग सारे| जान टूटी मृत हुई धारा| रो रहा विरहा किनारा| ना जहन में रहा पानी, दिखती नहीं कोई कहानी| नदि सुकड़ कर हो रही मरिया| ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया| बैठा दिए बक्ष पर कारखाने, नाले सब नदी में घुसाने| नदी की बाँध दी धारा, है मानव का उत्पात सारा| नित नये नाले बहाकर, सुखा दी उसकी अंतड़ियां| ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया| ना सरसिज हैं ना बचे मुर्गे,  खा  गए  सब  शीर्ष गुर्गे| मरे कछुए लुप्त सीपी, मिलती नहीं बतखें सरीखी| कहाँ हैं राज सारे तोड़ो सब किवरिया, ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया| दुर्गेश कुमार सराठे सजल 

कालिख

पत्थर के कागज पर कोयले की कलम से| कभी लिखा था तुम्हारा नाम, तब पता नहीं था कोयला कालिख युक्त होता है| भान ही नहीं था.... कि हाथ भी काले हो सकते हैं, और चहरा भी| बस लिख दिया था.. जो मन में आया| हृदय ने जो गाया, वक्त ने जो बतलाया| और कर बैठे हाथ काले, चहरे पर भी पौंछ डाले| कोयले को श्यामवर्ण का चंदन समझकर, कपड़े भी सन गए थे| मगर पता चला कि, कोयले में कालिख होती है| दुर्गेश कुमार सराठे सजल 

कविता

हृदय की कोमल वेदी पर, नित स्वप्नों का होम किया| कई कष्टों ने मान बढ़ाया, तब जीवन का सोम पिया| कई शूलों ने हृदय छीला| कितने किसने शूल जड़े| जितनी जितनी राहें बदली, अवरोधों  ने  पग  जकड़े| कितनी बार लगा हृदय को, जीवन मेधा शून हुई| अँध-धुँध ने पाँव पसारे,  तिमिर गेह ज्यों दून हुई| बड़ा कठिन-सा लगा हमें पर, मन में डर का शेष रहा| सजल छोड़ कर कितने भागे, सदा  मगर  दुर्गेश  रहा| दुर्गेश कुमार सराठे सजल 

समय समय की बात है

वर्तमान समय में जिस तरह पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण कर रहे हैं, वह एक दिन मानव को केवस हाड़ माँस का पुतला बनाकर ही छोड़ेगी| और कुछ को तो बना भी दिया है| इसके कुछ उदाहरण हमा...

पाती

आज जब मैं वर्तमान को देखता हूं तो बहुत ही मधुर फल मेरे नव प्रयाण के मार्ग में स्नेहा वादक बनकर प्रेम पाहन हो राह रोकने लगते हैं यह क्रिया शायद हर सरल हृदई व्यक्ति के साथ होती ...

प्रेमालय

तुमसे मिलने को आतुर हो, त्व नयनों को पढ़ने आया हूँ| कुछ शब्दों के मोती लेकर, प्रेमालय  गढ़ने  आया  हूँ| जहाँ ना कोई पूजालय है, ना दीपक है ना बाती| प्रेम हृदय में बसा रखा है, उसकी ज...

सूख चुके कुम्हलाये मन में

सूख चुके कुम्हलाये मन में, कैंसे अब तरूणाई आये| लहू लुहान हो वक्ष हृदय का, फिर कैंसे करूणाई छाये| दीपशिखा के जलते मन में, ढूब गया नवतारा| किरणपुंज को आहत करके, नाच रहा अंधयारा| ...

कविता

बढ़ी तपन है जीवन वन में, सूख गई कोमल फुलवारी| इच्छाएं हर पल मरती जाती, मची    हुई   है   मारा-मारी| पुष्प हुए अब छलिये सारे, उर के भीतर भरा कपट है| मानवता का ह्रास हुआ है, नैतिकता ...

कविता

अन मना सा मन हुआ क्यों? किसने दिल पर चोट जड़ी| चाँद  धरा  पर  आते-आते, तुम  पर  कैंसे  ओट  पड़ी? कहो ना कुछ तो मन के भँवरे, किन   पुष्पों  ने  घात किया? हृदय   भीतर   तीर चलाया, उरवन   में   उत्पात   किया? ऐसे डर कर चुप से क्यों हो? खिले खिले से रहने वाले| मौन औढ़ कर क्यों बैठो हो? पल पल में कुछ कहने वाले| हँसते खिलते से अधरों पर, मौनी  भूषण  नहीं सजाते| वन उपवन के रहने वाले, गमलों में कभी ना रह पाते| सजल सुनों तुम मन की पीड़ा, लैकिन  बिखर नहीं जाना| जितना किस्मत तुम्हें सताये, उतना तुम्हें निखर कर आना| दुर्गेश कुमार सराठे सजल

बैचैन बहुत हूँ

कविता बैचैन बहुत हूँ, दिल घबराया है| लगता है मन के ऊपर, घोर तिमिर का साया है| अंधकार डसने को आतुर, पुंज हृदय का खोया है| घोर निराशा जागी जागी, आशा का सूरज सोया है| नींद माँगते नयन ह...

बसंत सुनो तो

अरे बसंत,.. सुनो जरा़......| क्या? मानव की छाया पड़ गई, तुम पर| जो तुम भी, भर उठे, धूर्तता से लबालब| करने लगे हो, छल| हाड़ माँस के पुतले जैंसे| या फिर, बदल गया स्वभाव तुम्हारा| कुछ तो बात है| अब कह भी दो,यार| या फिर समझ लें हम ही| पतझड़ तो दिखा था| तुम ही नहीं दिख रहे आजकल| शब्द खोजते हैं, अकुला कर| आँखे  अलसा गई हैं| राह जोहते जोहते| तितलियों को भी, शिकायत है तुमसे| भँवरे रो रहे हैं| तुम्हें ना पाकर| सारा उपवन,तड़प रहा है| गले लगाने तुमको| कलम मचल रही है, तुमसे लिपटने| दोस्त, कुछ तो लिहाज रखो| दोस्ती की.......| दुर्गेश कुमार सजल

भौत कछु डूबो डरो कल्ल की रात में

कविता रो परी आज, भुन्सारे भुन्सारे...... दिनूगो तो हो गओ| मनों भौत कछु डूबो डरो है| कल्ल की रात में| चिरैयों की चीं चीं.. भैरानी-भैरानी फिरत है| सूरज विचारो..... डुकरिया के पल्ले में, मो ल...

पैर का जूता

आज एक सज्जन को जूते हाथ में लिये देखा तब सोचा आखिर जूता भी कोई हाथ में रखने की चीज है| लगता है सनक गया है| या दिमाग खराब है इसका,जो जूते हाथ में लेकर घूम रहा है| अब जूते हाथ में लिए ह...

कविता

स्वासें भी अब टूट रहीं हैं, पता नहीं क्या होगा कल? कलियाँ देखो भँवरे संग में, धोखा  देतीं  करतीं  छल| भले दाग हैं उसमें लैकिन, फैंक  ना  पाये प्रेमी रज| बिना प्रेम की बैशाखी के, ...

Valentine's day

वैलेंटाइनडे का जो प्रचलन भारत में हो रहा है वह उसका अपभ्रंश रूप है|..., वास्तविक वैलेंटाइनडे का अस्तित्व ही समाप्त है| और इसे प्रेमदिवस से अनुवादित कर दिया गया है,वह भी अपूर्ण ...

कविता

रूठे-रूठे ना घूमों तुम| तम के गम को ना चूमों तुम| रात बहुत प्रबल है| मैं हूँ आज,कहाँ फिर कल है? चारों ओर निशा के रथ में| घूम रहा छल हर इक पथ में| लिये अहम अपने मन में| तुम इतना ना इतराओ| ...

कविता

* कविता * कविता के प्राण तुम कहाँ हो? दिखते ही नहीं, आज कल| क्या बेसुध हो? या कहीं,,,,| किसी आश्रय की बाँहों में, स्वयं को समर्पित कर दिए हो| पर जो भी हो, तुम से मिलने का मन है| मगर.. तुम,ना ज...

फागुन और फरवरी

फ़रवरी का महीना प्रारंभ होते ही, बसंत ऋतु के आगमन का  आभास होने लगता है। प्रकृति में परिवर्तन होने का कार्य प्रारंभ हो जाता है। कुछ परिवर्तन तो होने भी लगते हैं,उनका अहसास भी होने ही लगा है। वातावरण मधुरता ग्राही हो गया है। एक उत्साहित करने वाली बयार की झंकार कर्णो को स्पष्ट सुनाई देने लगी है। पूरी प्रकृति हिलोरे लेने में व्यस्त है। किंतु ठंड का कहर अब भी क्षीण नहीं हुआ है। लगता है,वह फरवरी को त्रस्त करने के बाद ही विदा लेगी। बड़ी विडंबना है। धूप में बैठो तो शरीर पसीने से तर हो जाता है,और छाया कँप-कँपी पैदा कर देती है। प्रकृति अद्भभुत मज़किया रंग में रंगी है। हो भी क्यों ना,फागुन का आगमन जो होना है। वह तो हमारी प्रकृति के लिए विनोद का आश्रय स्थल है,जहां प्रकृति धूल से होली खेलती है।विविध रंगो के पुष्पों से सिंगार धारण कर लेती है। बिल्कुल सज-धज कर विनोद करती है। नवविवाहिता की भाँति,पूरे फागुन भर अपनी क्रियाकलापों से धमा चौकड़ी मचाये रहती है। अपने पराए का तो मानो उसमें कोई भाव ही नहीं,वह किसी को पराया नहीं मानती। सब पर धूल डालती है,रंगों की बौछार कर देती है। मानो संदेश दे रही हो...

कविता

हम तो काँटे हैं आश्रय देता जो भी हमको, दर्द उसी को दे जाते| रौंदे या  स्नेह करें, हम लहू तो उसका पी जाते| जब तक रहते पुष्प संग में, अवरोधी ही कहलाते| काँटों को कब प्यार मिला, रहे सद...