लैकिन उतने खोटे सब

हृदय जब से सीख गया है,
बातें बड़ी दबाना|
तब से शोणित भूल गया है,
दिल के दरबाजे पर आना|

रह रह करके रोदन करता,
लहू लहू पी पी जाता|
जिसके ऊपर कर रखते हम,
वह कंधा फिर ढह ही जाता|

कद के ऊँचे लोग बहुत से,
लैकिन मन से छोटे सब|
बातों से बस लगते चोखे,
लैकिन उतने खोटे सब||

दुर्गेश कुमार सराठे सजल

Comments

Popular posts from this blog

चिमनी

बचपन का मित्र

हे भगवान बनवा दो पटवारी