तुमसे मिलने को आतुर हो, त्व नयनों को पढ़ने आया हूँ| कुछ शब्दों के मोती लेकर, प्रेमालय गढ़ने आया हूँ| जहाँ ना कोई पूजालय है, ना दीपक है ना बाती| प्रेम हृदय में बसा रखा है, उसकी ज...
सूख चुके कुम्हलाये मन में, कैंसे अब तरूणाई आये| लहू लुहान हो वक्ष हृदय का, फिर कैंसे करूणाई छाये| दीपशिखा के जलते मन में, ढूब गया नवतारा| किरणपुंज को आहत करके, नाच रहा अंधयारा| ...