कविता
हृदय की कोमल वेदी पर, नित स्वप्नों का होम किया| कई कष्टों ने मान बढ़ाया, तब जीवन का सोम पिया| कई शूलों ने हृदय छीला| कितने किसने शूल जड़े| जितनी जितनी राहें बदली, अवरोधों ने पग जकड़े| कितनी बार लगा हृदय को, जीवन मेधा शून हुई| अँध-धुँध ने पाँव पसारे, तिमिर गेह ज्यों दून हुई| बड़ा कठिन-सा लगा हमें पर, मन में डर का शेष रहा| सजल छोड़ कर कितने भागे, सदा मगर दुर्गेश रहा| दुर्गेश कुमार सराठे सजल