कभी याद तो कर ही लेना
गहरी नदी के गहरे तल में, या कि डूब गए दल दल में| पता नहीं है कहाँ छिपे हो, सब कुछ भूल गए पल दो पल में| पहले दिन में बात अलग थी, बहुत मुखौटेबाजी थी| सबके सब ही सभ्य बने थे, आओ हवा जब ताजी थी| लैकिन धीरे परदे टूटे, झुण्ड अचानक बन बैठे| बहुत बढ़ी यह गुटबाजी में, फिर आपस में ठन बैठे| कभी साथ में कोई रहा था, सबकुछ कैंसे याद रहेगा| बटे हुए ए गुट प्रधानों, मन में छोटा वाद रहेगा| साथ में लेकर क्या आये थे, क्या लेकर के जाना है| कभी याद तो कर ही लेना, सब कुछ तो रह जाना है| दुर्गेश कुमार सराठे सजल