मन को तनिक सजग रखना
जीवन की यह डगर गजब है,
यहाँ अकेला चलना होगा।
साथ ना होंगे साथी सारे,
एकलता में ढलना होगा।
छोड़ छाड़ दो सब बंधो को,
इन्हें गले का फंद ना मानो।
नाते झूठे तोड़ो सारे,
इन्हें प्रेम के छंद ना मानो।
दीप जगत में तम में खोया,
तम का वह प्रवाहक है।
शीतलता में जलन बहुत है,
ठण्डी ठण्डी सी पावक है।
सजल तोड़ने वाला जग है,
जरा संभल कर पग रखना।
घात मिलेंगे स्व हाथों से,
मन को तनिक सजग रखना।
दुर्गेश कुमार सराठे "सजल"
पुरैना कलाँ,बनखेड़ी,नर्मदापुरम्,म.प्र.,भारत
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