ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया?

बड़ी नदियाँ,बही नदियाँ|
बढ़ी नदियाँ,धरा के जहन में गढ़ी नदियाँ|
ए निर्लज्ज लोगों,बताओ कहाँ नदियाँ?

ना उनमें रेत ओ बालू|
हर घाट में उत्खनन चालू|
ना बची हैं मीन भीतर,
तटों पर दिखते नहीं कबूतर|
टूट-टूट कर हो गई वह दरिया|
ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया?

दिखते नहीं हरे भरे से किनारे,
चर गए हम लोग सारे|
जान टूटी मृत हुई धारा|
रो रहा विरहा किनारा|
ना जहन में रहा पानी,
दिखती नहीं कोई कहानी|
नदि सुकड़ कर हो रही मरिया|
ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया|


बैठा दिए बक्ष पर कारखाने,
नाले सब नदी में घुसाने|
नदी की बाँध दी धारा,
है मानव का उत्पात सारा|
नित नये नाले बहाकर,
सुखा दी उसकी अंतड़ियां|
ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया|

ना सरसिज हैं ना बचे मुर्गे, 
खा  गए  सब  शीर्ष गुर्गे|
मरे कछुए लुप्त सीपी,
मिलती नहीं बतखें सरीखी|
कहाँ हैं राज सारे तोड़ो सब किवरिया,
ए निर्लज्ज लोगो,बताओ कहाँ नदिया|

दुर्गेश कुमार सराठे सजल 

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