फ़रवरी का महीना प्रारंभ होते ही, बसंत ऋतु के आगमन का आभास होने लगता है। प्रकृति में परिवर्तन होने का कार्य प्रारंभ हो जाता है। कुछ परिवर्तन तो होने भी लगते हैं,उनका अहसास भी होने ही लगा है। वातावरण मधुरता ग्राही हो गया है। एक उत्साहित करने वाली बयार की झंकार कर्णो को स्पष्ट सुनाई देने लगी है। पूरी प्रकृति हिलोरे लेने में व्यस्त है। किंतु ठंड का कहर अब भी क्षीण नहीं हुआ है। लगता है,वह फरवरी को त्रस्त करने के बाद ही विदा लेगी। बड़ी विडंबना है। धूप में बैठो तो शरीर पसीने से तर हो जाता है,और छाया कँप-कँपी पैदा कर देती है। प्रकृति अद्भभुत मज़किया रंग में रंगी है। हो भी क्यों ना,फागुन का आगमन जो होना है। वह तो हमारी प्रकृति के लिए विनोद का आश्रय स्थल है,जहां प्रकृति धूल से होली खेलती है।विविध रंगो के पुष्पों से सिंगार धारण कर लेती है। बिल्कुल सज-धज कर विनोद करती है। नवविवाहिता की भाँति,पूरे फागुन भर अपनी क्रियाकलापों से धमा चौकड़ी मचाये रहती है। अपने पराए का तो मानो उसमें कोई भाव ही नहीं,वह किसी को पराया नहीं मानती। सब पर धूल डालती है,रंगों की बौछार कर देती है। मानो संदेश दे रही हो...