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Showing posts from February, 2019

Valentine's day

वैलेंटाइनडे का जो प्रचलन भारत में हो रहा है वह उसका अपभ्रंश रूप है|..., वास्तविक वैलेंटाइनडे का अस्तित्व ही समाप्त है| और इसे प्रेमदिवस से अनुवादित कर दिया गया है,वह भी अपूर्ण ...

कविता

रूठे-रूठे ना घूमों तुम| तम के गम को ना चूमों तुम| रात बहुत प्रबल है| मैं हूँ आज,कहाँ फिर कल है? चारों ओर निशा के रथ में| घूम रहा छल हर इक पथ में| लिये अहम अपने मन में| तुम इतना ना इतराओ| ...

कविता

* कविता * कविता के प्राण तुम कहाँ हो? दिखते ही नहीं, आज कल| क्या बेसुध हो? या कहीं,,,,| किसी आश्रय की बाँहों में, स्वयं को समर्पित कर दिए हो| पर जो भी हो, तुम से मिलने का मन है| मगर.. तुम,ना ज...

फागुन और फरवरी

फ़रवरी का महीना प्रारंभ होते ही, बसंत ऋतु के आगमन का  आभास होने लगता है। प्रकृति में परिवर्तन होने का कार्य प्रारंभ हो जाता है। कुछ परिवर्तन तो होने भी लगते हैं,उनका अहसास भी होने ही लगा है। वातावरण मधुरता ग्राही हो गया है। एक उत्साहित करने वाली बयार की झंकार कर्णो को स्पष्ट सुनाई देने लगी है। पूरी प्रकृति हिलोरे लेने में व्यस्त है। किंतु ठंड का कहर अब भी क्षीण नहीं हुआ है। लगता है,वह फरवरी को त्रस्त करने के बाद ही विदा लेगी। बड़ी विडंबना है। धूप में बैठो तो शरीर पसीने से तर हो जाता है,और छाया कँप-कँपी पैदा कर देती है। प्रकृति अद्भभुत मज़किया रंग में रंगी है। हो भी क्यों ना,फागुन का आगमन जो होना है। वह तो हमारी प्रकृति के लिए विनोद का आश्रय स्थल है,जहां प्रकृति धूल से होली खेलती है।विविध रंगो के पुष्पों से सिंगार धारण कर लेती है। बिल्कुल सज-धज कर विनोद करती है। नवविवाहिता की भाँति,पूरे फागुन भर अपनी क्रियाकलापों से धमा चौकड़ी मचाये रहती है। अपने पराए का तो मानो उसमें कोई भाव ही नहीं,वह किसी को पराया नहीं मानती। सब पर धूल डालती है,रंगों की बौछार कर देती है। मानो संदेश दे रही हो...

कविता

हम तो काँटे हैं आश्रय देता जो भी हमको, दर्द उसी को दे जाते| रौंदे या  स्नेह करें, हम लहू तो उसका पी जाते| जब तक रहते पुष्प संग में, अवरोधी ही कहलाते| काँटों को कब प्यार मिला, रहे सद...

कविता

जिसके कंधे पर सर रख पाते अपने हृदय की व्यथा सुनाते ऐसा कोई अपना भी तो होता जिसको हम अपना कह पाते जिससे होती मीठी मीठी बाते जिसकी  यादों में  कटती रातें जिससे  कभी  झगड़ भी प...

कविता

कुछ तो कहती रहो, वायु सी नित बहती रहो| नदियों के जल की कल कल, बसंत  ऋतु के गुंजित पल| पंछी के कलरव का शोर, कभी पपीहा और चकोर| बन हृदय की श्वास, कभी तो फिर से लौटो| यूँ मौन औढ़ ना बैठो| स...

कविता

अपने मन की बात जतन से बहुत झिझक कर कहता है कुछ रुकता है कुछ झुकता है यूँ रुकता रुकता बहता है बात बंद है, जबसे तुम से.. मन दुखता दुखता रहता है लगता सारे बंध टूट गए कवि के सारे छंद र...

कविता

मेरे मन मैं चिंतित हूँ कुछ समस्याओं से थोड़ा चिड़ा भी हूँ तुमसे शिकायतें भी बहुत हैं पर तुमसे कुछ नहीं कहूँगा बैंसे तुम्हे पता तो है मेरा स्वभाव... बैंसे भी हम एक ही यात्रा क...

तुम साथ होते तो

तुम साथ होते तो, सफर बातों बातों में कट जाता| यूँ दुख से आहत ना होता.., थोड़ा थोड़ा बट जाता| भले अंधेरे में चलते, पर पुंज हृदय में पट जाता| अरे रात को चलने देते, सुबह अंधेरा छट जाता| मेरे मन तुम ना भागे होते, मैं पावक में डट जाता| अरे तनिक रुक तो जाते, स्वयं लुटेरा हट जाता| हृदय में यूँ दंस ना होते, पीयूष हृदय में रट जाता| गरल अगर मैं पी जाता, सबकुछ वहीं सिमट जाता| ना फिर तुम वागी होते, रुदन तुम्हारा घट जाता| दुर्गेश कुमार सराठे

कविता

किसको अपनी व्यथा बतायें? किससे कह दें दिल का रोना? भर  भादों  सा  टपक रहा है, मन की छत का कोना कोना| लैकिन फिर भी सीख चुका हूँ, विचलित नहीं मुझे अब होना| पर्वत   पर्वत   पीर   शिख...

कविता

मन चिंतित था पर चिंता... कोई तीव्र नहीं.. वह तो एक.. तृण तंतु सम एक झकोरे से.. उड़ जाती है| मन के क्षितिज में| जब कभी... चिंता उतर जाती है| हृदयतल के तीव्र भंवर में.. लगता है| कोई नदी सूख गई.. ...

कविता

कभी दिल कहता है| कोई  हो. जो  सीने से.. ऐसे लगा ले.. जैंसे सागर नदी को.. अपने भीतर समा लेता है| धरती सह जाती है, अपनों की, सारी धृष्टताएं| पेड़ कभी, उलाहना नहीं देता, पत्थर मारने पर| जल ...