कविता
कुछ तो कहती रहो,
वायु सी नित बहती रहो|
नदियों के जल की कल कल,
बसंत ऋतु के गुंजित पल|
पंछी के कलरव का शोर,
कभी पपीहा और चकोर|
बन हृदय की श्वास,
कभी तो फिर से लौटो|
यूँ मौन औढ़ ना बैठो|
स्तब्ध अंधेरा,
निरजन पथ|
तुम नहीं साथ,
बस यादों का रथ|
बस सफर,
अकेला काट रहा हूँ|
तम के घर में,
दीपक मैं बाट रहा हूँ|
तुम दूर बैठकर केवल,
चहरा ना देखो|
कुछ तो कहदो,
यूँ मौन औढ़ ना बैठो|
मेरे प्रश्नों के उत्तर को,
मुस्का कर टालो ना|
गिरता हूँ तो गिरने दो,
हाथ बढ़़ाकर मुझे सम्भालो ना|
ठीक नहीं यूँ हृदय भेदन
सीधे मारो दिलपर भाला
फिर घायल कर डालो ना
ऐसे मीठे रूठ रूठ कर
क्षमा पत्र ना पेठो
अधरों से कुछ तो कह दो
यूँ मौन औढ़ ना बैठो
दुर्गेश कुमार सराठे
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