कविता
कभी
दिल कहता है|
कोई हो.
जो सीने से..
ऐसे लगा ले..
जैंसे सागर नदी को..
अपने भीतर समा लेता है|
धरती सह जाती है,
अपनों की,
सारी धृष्टताएं|
पेड़ कभी,
उलाहना नहीं देता,
पत्थर मारने पर|
जल सबको अपनाकर,
प्यास बुझा देता है|
कोई बृक्ष हो.
विश्राम कर सकूँ|
उसकी शीतल छाया में|
यहाँ तपन जला रही है,
हृदय के आँगन को|
उसे कोई नदी चाहिए|
दुर्गेश कुमार सजल
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