कविता

अपने मन की बात जतन से
बहुत झिझक कर कहता है
कुछ रुकता है
कुछ झुकता है
यूँ रुकता रुकता बहता है
बात बंद है,
जबसे तुम से..
मन दुखता दुखता रहता है

लगता सारे बंध टूट गए
कवि के सारे छंद रूठ गए
एक तुम्हारे ना कहने से
हृदय भीतर क्रंद फूट गए
हृदय के इस क्रंदन से
मन उकता उकता रहता है
बात बंद है,
जबसे तुमसे..
मन दुखता दुखता रहता है

दुर्गेश कुमार सराठे

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