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Showing posts from January, 2020

कविता

शोषण की छाती छीलो, पथ  के सारे पाहन तोड़ो। जो भी तुमको रोक रहे हैं, पहले उनको पकड़ मरोड़ो। जातिवादी कुछ टुच्चे तो, रहे सदा से राहों में। लैकिन इनको तोड़ो-ताड़ो, धरो शूल अब बाँहों में। कब तक रोओगे किस्मत पर, कब तक खुद को तोड़ोगे? झूठ मूठ के इस ढर्रे को , कहो सखे कब छोड़ोगे? रुको नहीं इन रोधों पर, इनको आखिर ढहना है। नदी की भाँति बढ़े चलो, अविरल पथ पर बहना है। दुर्गेश कुमार सराठे "सजल" पुरैना कलाँ,बनखेड़ी,होशंगाबद,मध्यप्रदेश,भारत

कविता

चोर सुतों की ऐंसी तैसी, लूट रहे नित नये खजाने | सच कहने में जीभ हकलती, चुप बैठे कई जाने माने | सज्जनता के साधू बनकर, चर चर सेठ हुए सब चरकर | मातृभूमि तक चबा गए वह, सारे ऐसे  चोर चिनरकर| नहीं कलम पर बंदिश कोई, ना मैं चुप रहने वाला| चोरों को तो चोर कहूँगा, नहीं रुकेगा लिखने वाला| दुर्गेश कुमार सराठे 'सजल' पुरैना कलाँ बनखेड़ी मध्यप्रदेश 8819930876

राजनेता

फूलों को नित छलने वाले, सच को रोज मसलने वाले। पग पीड़ा को क्या समझेंगे, कालीनों  पर  चलने  वाले। भ्रष्टा जी के सगे पुत्र हैं, चोर चपाटों के साले। डाकूसुत ही बना दिये हैं| हमने अपने रखवाले। श्रमसाधक का श्रम तक चरते, अपराधयुक्त यह निर्भय फिरते। सज्जनता   का  चोला पहने, कैंसे     कैंसे    धूर्त   विचरते। दुर्गेश कुमार सराठे सजल

छुआछूत के बंधन तोड़ो

छुआछूत के बंधन तोड़ो, ऊँच नीच की माला| जातिवाद का किला ढहा दो, फैले  नया उजाला| मानव मानव मन के मन में, कोई द्वेष रहे ना| प्रेम हृदय में भर जाने दो, नफ़रत कहीं बहे ना| कभी राम ने बेर भखे थे, झूठे माता सबरी के| हम भी सबको गले लगायें, रत दें पल खुश खबरी के| दुर्गेश कुमार सराठे सजल  पुरैना कलाँ बनखेड़ी होशंगाबद मध्यप्रदेश  8819930876