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Showing posts from April, 2021

मैं भारत का सूरज हूँ।

मैं भारत का सूरज हूँ,  अंधयारे से डरता हूँ। बांध रखा है तम ने मुझको, भय से रोज विचरता हूँ।                    जकड़ रखे हैं पाँव किसी ने,                    कहीं कलाई बौनी है।                     जिह्वा पर है जोर किसी का,                     काटों की कहीं बिछौनी है। क्रंदन करती मेरी किरणें, धूप दर्द की वाहक है। नहीं मिटेगा अंध यहाँ का, जिसका पुंज सहायक है।                          बैंसे भी तो कम दिखता हूँ,                          ऊपर से बादल छा जाते हैं।                          डसने पंथ कौम ओ जाति,                           हर...

दर्द कहानी

      दर्द (मोहनदास नेमिशराय)                       अंधेरा घिर आया था। हरभजन घर नहीं लौटा था। हरदेई घर के बाहर दरवाजे के पास खड़ी थी। उसकी आंखें हर उस आदमी को देखती थी,जो सड़क से गली में प्रवेश करता था। बार-बार यही क्रम दोहराती थी वह। आंखें थक चली थी उसकी,पर प्रतीक्षा अभी शेष थी। खाली सी हुई आंखों में उदासी भर आई थी। थकान तो पहले से ही थी। आकाश में बादल थे और परिवेश में उमस।             एक-एक आदमी गली में आता और अपने अपने घर में चला जाता।  घर-घर में बच्चों की मिली-जुली आवाजें गूंजती,चूड़ियाँ खनकती,बर्तन बजते और शिकायत के साथ सम्मोहन की अजीब सी गंध बैठकखानों ,आंगनों बालकनी और छतों के आस-पास उभर आती थी। बस्ती के प्रत्येक घर में स्पंदन था और गहमागहमी भी। वह अकेला घर था जिसमें वैसा कुछ भी ना था बेटा घर के भीतर पड़ी चारपाई पर बैठा हुआ पढ़ाई कर रहा था। और सुमन रसोई में दाल बन रही थी। घर की दीवारें शांत थीं। थोड़ी बहुत आवाज थी,तो केवल सीलिंग फैन की।घर में 3 प्राणी थे।वे तीनों ही अजीब सी चुप...