दर्द कहानी
दर्द (मोहनदास नेमिशराय)
अंधेरा घिर आया था। हरभजन घर नहीं लौटा था। हरदेई घर के बाहर दरवाजे के पास खड़ी थी। उसकी आंखें हर उस आदमी को देखती थी,जो सड़क से गली में प्रवेश करता था। बार-बार यही क्रम दोहराती थी वह। आंखें थक चली थी उसकी,पर प्रतीक्षा अभी शेष थी। खाली सी हुई आंखों में उदासी भर आई थी। थकान तो पहले से ही थी। आकाश में बादल थे और परिवेश में उमस।
एक-एक आदमी गली में आता और अपने अपने घर में चला जाता। घर-घर में बच्चों की मिली-जुली आवाजें गूंजती,चूड़ियाँ खनकती,बर्तन बजते और शिकायत के साथ सम्मोहन की अजीब सी गंध बैठकखानों ,आंगनों बालकनी और छतों के आस-पास उभर आती थी। बस्ती के प्रत्येक घर में स्पंदन था और गहमागहमी भी। वह अकेला घर था जिसमें वैसा कुछ भी ना था बेटा घर के भीतर पड़ी चारपाई पर बैठा हुआ पढ़ाई कर रहा था। और सुमन रसोई में दाल बन रही थी। घर की दीवारें शांत थीं। थोड़ी बहुत आवाज थी,तो केवल सीलिंग फैन की।घर में 3 प्राणी थे।वे तीनों ही अजीब सी चुप्पी लिए अपने-अपने कार्य में व्यस्त थे। आकाश का कल पेपर था। वह सामान्य ज्ञान की पुस्तक में खोया था। सुमन को भोजन तैयार करना था,इसलिए रसोई में उसने अब दाल पानी में भिगो दी थी। और बाहर हरदेई मानो,हरभजन की माँ अभी भी बेटे के इंतजार में थी।
अंधेरे में जमीन का कौना-कौना घिरने लगा था। बस्ती में प्रकाश की व्यवस्था न थी। सिर्फ घरों से बाहर आती उजाले की रेखाओं और धुएं की लकीरों से लगता था कि यह भी कोई बस्ती है। शहर की पश्चिम दिशा में यह बस्ती जमीन के लगभग पाँच एकड़ में विराजमान थी। प्रकाश की अव्यवस्था गली में खड़जे की ऊबड़-खाबड़ स्थिति और मकानों की पलास्तर उखड़ी दीवारें,इस बात का संकेत दे रही थीं।कि सरकार द्वारा घोषित गरीबी रेखा से थोड़ा सा ऊपर के लोग इस बस्ती में रहते थे। इनके भी सपने थे।भले ही वह पूरे ना हुए हों।
आकाश को पढ़ते हुए थोड़ी थकान सी महसूस हुई। वह किताब एक तरफ रख पानी पीने के लिए रसोई में चला गया। सुमन अब तक अंगीठी पर पतीली रख दाल छोंक चुकी थी। बेटे को सामने देखा तो घड़े को तिरछा उंडेल कर गिलास में पानी डाल उसे दे दिया। पानी पीते हुए पूछ बैठा वह। "पिताजी अब तक नहीं लौटे ऑफिस से?" उदासी में डूबा स्वर उभरा था। माँ के गले से,"नहीं।" बेटे ने फिर सवाल किया था,"पर क्यों माँ,अब तक तो उन्हें आ जाना चाहिए।"
सुमन इतना ही कह सकी,"हाँ बेटे।"
आकाश वहाँ से हटकर बाहर गया था। हरदेइ अभी भी दीवार से पीठ लगाए हरभजन की बाट जो रही थी। आकाश के पैरों की आवाज से उसका ध्यान बंटा। तभी वह बोल उठा,"बड़ी माँ कमरे के भीतर आ जाओ। पिताजी आते ही होंगे बस।" हरदेई ने जैसे अपने आप को दिलासा दी थी।
"हाँ बेटे तू ठीक कहवै है। बस्स आत्तेई होंगे तेरे पिताजी। पर मन नहीं माना था। इसलिए पूछ बैठी,टेम कितना हो गया?"
आकाश ने दीवार पर लगी घड़ी में समय देखा। 8:00 बजे थे दोनों हाथ की अंगुलियों से बतला दिया था। समझ कर बोल उठी थी वह,"आठ?" आकाश के मुंह से हुंकार निकली थी। फिर कहा था उसने,"घना टैम हो गया।"
इस बार आकाश चुप रहा। वह पुनः कमरे में आ गया था। सामान्य ज्ञान की किताब उठाकर वह फिर से पढ़ने लगा था। सुमन अभी रसोई में ही थी। दाल में जोरों से फड़के पड़ने लगे थे। इस बीच उसने आटा भी गूंद लिया था। हरदेई कमरे में दरवाजे के बीचों बीच बैठ गई थी। टांगेे भी उसकी थक चली थीं। आंखें उसकी गली के बाहर पसरे अंधेरे में खोई थीं। उसके भीतर से बार-बार सवाल उपज रहे थे। उन सवालों की भाषा लगभग एक जैसी थी। पर उत्तर नदारद था। सवाल ही सवाल थे। जो उसके मन के साथ बूंढ़े हो चले शरीर को भी कचोट रहे थे। दाल बन गई थी। सुमन ने बटलोई नीचे रख दी थी। वह रोटियां बनाना ही चाहती थी कि बीच में रुक गई। पति के इतनी देर गए ना लौटने से मन उद्विग्न सा हो उठा। आटा, दाल सभी कुछ छोड़कर बाहर आ गई थी। हरदेई भी वहीं थी। माँ को बेटे की प्रतीक्षा जो थी। वैसा ही इंतजार पत्नी को भी था। आकाश का मन भी पढ़ाई में नहीं लग रहा था। थोड़ी देर में वह फिर से बाहर आ गया था। तीनों एक दूसरे की तरफ देखते भर थे। सवाल भी करें तो क्या,बार-बार वही सवाल।जिनके जवाब भी अधूरे मिलते। बस्ती का परिवश कोलाहल से भरपूर था,पर वे तीनों ही अजीब सी चुप्पी में डूबे थे। किसी टापू पर जैसे अकेले हों। उनके भीतर से तरह-तरह की आशंकाएं उभर रही थी।जो उन्हें विचलित करने लगी थी। आकाश की आंखें बार-बार दीवार की घड़ी की ओर उठ जाती थी। अब तक 9:00 बज चुके थे। उसके मन में वही सवाल उठता था। पिता जी अब तक क्यों नहीं आए। वे तो 7:00 बजे तक आ जाते थे। इस बीच सुमन रसोई में दो बार हो आई थी। बड़ी मुश्किल से दो चार घूंट पानी उंडेल पायी थी गले के नीचे। हरदेई टस से मस नहीं हुई थी। उसकी आँखें अभी भी बाहर से भीतर आने वाले रास्ते पर लगी थीं।
अनायास उसे रास्ते पर एक छाया दिखाई दी। हरदेई की अभ्यस्त आँखें उसी तरफ थीं। उसने पहचान लिया। बस्ती में प्रवेश करने वाला और कोई नहीं हरभजन था। उसका अपना बेटा। कपड़े भी वही थे और चाल-ढाल भी। तब तक सुमन कमरे में आकाश के पास चली गई थी। हरदेई बाहर अकेली थी। हरभजन नजदीक आया तो वह पूछ बैठी, "क्यूं हरभजन,इतनी देर कहाँ लग्ग गई?" बिना कुछ जवाब दिए हरभजन अब तक अपना शरीर ढेलता हुआ सा कमरे के भीतर आ गया था।
पत्नि और बेटे ने देखा तो तसल्ली हुई। कमरे में हरदेई पीछे-पीछे आ गई थी। वह पुनः पूछने ही वाली थी कि सुमन का आशंका से भरा हुआ स्वर उभरा था। "क्यों जी,कहीं किसी से झगड़ा तो नहीं हो गया।" कमीज के टूटे बटन देखकर ही सुमन ने सवाल किया था। इस बीच आकाश रसोई में जाकर घड़े का पानी गिलास में ले आया था। बदहबास जैंसी स्थिति में हरभजन ने बेटे के हाथ से पानी का गिलास लेकर सूखे हो चले गले में उसे उंडेला था। पानी पीकर धम्म से कुर्सी पर बैठ गया था वह। बिखरे बाल,अस्त व्यस्त कपड़े और माथे पर उभर आई सलवटों ने माँ,पत्नि,और बेटे को परेशान कर दिया था। पूछने तक की हिम्मत ना हुई थी उनकी। सुमन का सवाल सुनकर भी हरभजन जैसे जवाब देने की स्थिति में नहीं था। उसके सांसे तेजी के साथ चलने लगी थी।चेहरे पर पीड़ा के अनगिनत भाव थे। इसके बाद हरदैई का द्रवित स्वर रहा था।"तू बतलाता क्यों नहीं हरभजन?" हरभजन ने अपनी छाती पर हाथ रखते हुए देखा भर था मां की ओर।
मां ने बेटे की आंखों में पीड़ा के बहते दरिया को महसूस किया। माथे पर उभरी अनगिनत रेखाओं को पढ़ा और उसकी बेचैनी को करीब से जाना। फिर बोली थी वह,"तुझे दर्द है" हरभजन फिर भी मौन था। पुनः हरदैई का स्वर उभरा था। "मुझे मालूम है दर्द होने पर भी तू कभी बोलता नहीं,कुछ बतलाता नहीं,अस्स,सैता रैता है....।" सुनकर हरभजन के मुंह से वेदना से भरा स्वर उभरा था।
"माँ....।" हरदेई को कहीं गहरे पीड़ा का अहसास हुआ था। उसकी आँखों में आसूँ झिलमिलाने लगे थे। आंखों में आंसू सुमन के भी थे वह रसोई में जाकर गीले आटे पर कपड़ा रख आई थी और आकाश में सामान्य ज्ञान की किताब के खुले प्रष्ठों को बंद कर दिया था उसके भीतर पीड़ा और छटपटाहट उभर आई थी पिताजी का दर्द उससे देखा नहीं जा रहा था पहले भी ऐसा ही दर्द उभरा था बहुत पूछने पर हरभजन ने घर में अपनी व्यथा बता लाई थी ऑफिस में 10 बरस से उनकी पदोन्नति नहीं हो पा रही थी। उनके खिलाफ संयुक्त रुप से यह साजिश थी।
पीड़ा ने अतीत को कुरेद दिया हो। दादाजी के मृत्यु चित्र आकाश की आँखों के सामने तैर उठे थे। उनकी दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। पिताजी उस समय मैट्रिक थे। मैट्रिक होने के बावजूद उन्हें चपरासी का पद मिला था। दादाजी राज्य सरकार की सेवा में चपरासी थे। चपरासी के बदले चपरासीगिरी उन्हें मिल गई थी। यही सरकारी नियम था। ऐसा उन्हें बताया गया था। साथ में आश्वासन भी मिला था पदोन्नति का। जो समाज में नियम था वही सरकार में भी था। पहले ही दिन बड़े बाबू ने झिड़क दिया था। "चपरासी के बेटे होकर चपरासी नहीं बनोगे तो क्या लाटसाहब बनोगे।" तभी हरदेई की आवाज से व्यथा से भरे आकाश का ध्यान उचट गया था। दादी का स्वर जैंसे कुएं से उभरा हो, "डागडर को बुला ला बेटे।" हरभजन मना करना चाहता था,पर उसकी आवाज गले से बाहर निकल ना पा रही थी। पथराई सी आंखों ने देखा,उसका बेटा डाक्टर को लेने चला गया था। उसे दर्द बढ़ने लगा था। सांसें तेजी से चलने लगीं थीं। आँखों के भीतर अंगारें दहकने लगे थे। माँ और पत्नि हरभजन की बदलती हालत को टकटकी लगाए देख भर रहीं थीं। दर्द उनके भीतर भी था। ये सोच रही थी हरभजन का क्यों उसके ऑफिस वालों से झगड़ा होता है। जब भी झगड़ा होता है,तब बैचैनी लिए घर लौटता है।
यही सवाल स्वयं हरभजन को भी परेशान किए था। जितना वह इस बारे में सोचता,उसे लगता वह अपने जख्मों को कुरेद रहा है। जख्म ही तो थे उसके वे। जिन्हें बार-बार मौका पा ऑफिस में छेड़ा जाता था। 10 साल में उसकी पदोन्नति तो,बहुत पहले ही हो जाना चाहिए थी। वह पिछले सप्ताह मुख्यालय भी हो आया था। जहाँ से उसकी पदोन्नति का पत्र भेज दिया गया था। पर उसके ऑफिस में पत्र नहीं पहुंचा था। अधिक पूछने पर बाबू आर.के.शर्मा ने गुस्से में जैसे उसके सारे वज़ूद को हिला कर रख दिया था। उसे पहली बार पता चला था। जात के सवाल कितने निर्मम होते हैं। और उसके जवाब भी। बड़े बाबू का जवाब भी तो निर्मम ही था। उसने घृणा के स्वर में कहा था,हरभजन मेरे जीते जी तू इस ऑफिस में बाबू नहीं बन सकता। चपरासीगिरी कर और अपने बच्चों को पाल।
उसके पिता चपरासी, वह चपरासी क्या उसका बेटा भी चपरासी ही बनेगा। यही सोचते हुए हरभजन के सीने में तेज दर्द उठा और पल भर में ही उसका शरीर ठंडा हो गया।दोनों महिलाओं की चीख निकली जो आसपास के वातावरण को उद्वेलित करते हुए दूर तक चली गई थी।सामने दरवाजे पर डॉक्टर था। आकाश अपलक नयनों से अपने पिता को घूरने लगा था। हड़बड़ाहट में डॉक्टर ने दम तोड़ चुके हरभजन के शरीर की धड़कनों को सुनने का प्रयास किया। पर वे सांसे कभी की बंद हो चुकी थी। ह्रदय गति रुकने से एक अदद चपरासी की मौत हो गई थी।
सुबह तक आसपास के सभी लोगों को हरभजन के अचानक चल बचने की खबर लग गई थी़। बस्ती के हंसते गाते जीवन में खलल पड़ गई थी। बांस की खच्चियाँ अर्थीं के लिए बनाई जाने लगीं थीं। तभी बड़े बाबू आ गए थे। उनके हाथ में पदोन्नति पत्र था। आँखों में आँसु। उन्हें क्या मालूम था कि उसके कटु शब्द हरभजन की जान ही ले लेंगें। आकाश ने जलती आँखों से बड़े बाबू की ओर देखा था और पदोन्नति पत्र लेकर उसे कफ़न के साथ रस्सी से बांध दिया था।
मोहनदास नेमिशराय जी
Comments
Post a Comment