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Showing posts from September, 2017

अंधकारवादिता

🙏🙏🙏🙏🙏🙏 आओ दोस्तों आज बताये, उन अंघे बहरे लोगों को जो| सुन पाये न देख सके, जन -जन के असह दुखों के ठेरों को| एक तरफ नेता जी अरब पति, और एक तरफ गंगू सा तेली| नेता सबरे मौज उड़ा रहे, जनत...

बचपन

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durgesh kumar Public Sep 8, 2017  यारों बचपन का भी क्या कहना नादान हुआ करते थे तब मिट्टी से खेला करते थे तब धूल भरे कपड़ों में खेला करते थे तब न तन की चिंता, न खाने की न सोने की चिंता न नहाने की सुबह खेला करते थे आंगन में एक दूजे से लड़ते भी थे आंगन में पर जाने कब हम बढ़े हो गए मतलबी दुनिया में ऐसे खो गए न दोस्त को याद किया न आया जहाँ गए अपना मतलब ही पाया न जाने कहाँ खो गया वह दुर्गेश जो लड़ता बहुत था निर्निमेष वह दोस्त नहीं बचे लड़ने वाले अब बचपन में बड़ा झगड़ते थे तब याद बहुत आती है मुझे बचपन की यारी बात-बात पर उसे चिड़ाना और मारा-मारी एक कही उसने तो चार जमाये हमने और जब हम पीछे हटते, दुगुने मारे उसने ऐसे लड़ने वाले दोस्त कहां है अब ढूँढ रहा हूँ इस दुनिया में उसको अब तो आजा उस दुनिया से फिर से लड़ बैठेगें अब

आशावादिता

🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞 🌄तम का सीना चीर डालो 🌄 बाधाओ को तुम मीड़ डालो लक्ष्य को जहन में बसाकर दुर्गम राहों पर दौड़-दौड़ कर 🌜अपने पैरों से लकीर डालो 🌁 बाधाऔ से लड़ने में 🌁 ताकत बढ़ती है...

निराशा

जब घोर निराशा छा जाये पथ भी काटों से भर जाये जब राह दिखाई न देती हो पथ भटकाने वाले उस पथ में तब हो सवार बढ़ जाना आशाओं के अविरल रथ में        ऐसा दिन एक दिन आता है        पथ भी राह...

माँ

👏माँ को समर्पित मेरी यह कविता 👏 🌴वह बचपन में एक दूजे से लड़ जाना, 🌴 🌳बात -बात पर रिसियाकर भौह चढ़ाना 🌳 🔴एक खिलौने की खातिर , दिन -दिन भर माँ को नाच नचाना 🔵 🌺फिर माँ से पिटने पर द...