बचपन
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यारों बचपन का भी क्या कहना
नादान हुआ करते थे तब
मिट्टी से खेला करते थे तब
धूल भरे कपड़ों में खेला करते थे तब
न तन की चिंता, न खाने की
न सोने की चिंता न नहाने की
सुबह खेला करते थे आंगन में
एक दूजे से लड़ते भी थे आंगन में
पर जाने कब हम बढ़े हो गए
मतलबी दुनिया में ऐसे खो गए
न दोस्त को याद किया न आया
जहाँ गए अपना मतलब ही पाया
न जाने कहाँ खो गया वह दुर्गेश
जो लड़ता बहुत था निर्निमेष
वह दोस्त नहीं बचे लड़ने वाले अब
बचपन में बड़ा झगड़ते थे तब
याद बहुत आती है मुझे बचपन की यारी
बात-बात पर उसे चिड़ाना
और मारा-मारी
एक कही उसने तो चार जमाये हमने
और जब हम पीछे हटते, दुगुने मारे उसने
ऐसे लड़ने वाले दोस्त कहां है अब
ढूँढ रहा हूँ इस दुनिया में उसको
अब तो आजा उस दुनिया से
फिर से लड़ बैठेगें अब

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