माँ

👏माँ को समर्पित मेरी यह कविता 👏
🌴वह बचपन में एक दूजे से लड़ जाना, 🌴
🌳बात -बात पर रिसियाकर भौह चढ़ाना 🌳
🔴एक खिलौने की खातिर ,
दिन -दिन भर माँ को नाच नचाना 🔵
🌺फिर माँ से पिटने पर
दिन -दिन भर अश्रु धार बहाना 🌺
🌷याद बहुत आता है मुझको,
माँ की लोरी का वह एक तराना 🌷
🍂काश मेरे बचपन के ये जाते हुये दिन
फिर लौट -लौट कर आते,🍂
🍃 हम फिर माँ से रूठ -रूठ कर,
माँ को अपने पीछे दौड़ाते 🍃
⛄करते ऊधम पहले जैसे,
जिनके कारण माँ के हाथों पिट पाते, ⛄
🌞कुछ भी कहो पर माँ से पिटने पर,
याद बहुत आता है मुझको वह
मम्मी -मम्मी की टेर लगाना🌞 🌞अगर कहीं हम रूठा करते थे माँ से, तब माँ हमे प्यार से अपने पास बुलातीं थीं,🌙
बाहर से बेहद गुस्सा पर,
अन्दर से करूणा लेकर, 🌙
अपने हाथों से दूध रोटी हमें खिलातीं थीं, 🌜
🌜कुछ भी  कहलो,पर माँ तो माँ होती है, 🌜
🌄जो अपने बच्चो की खातिर,
हर दुख को हस कर ढोती है 🌅
📖गीतकार📖
दुर्गेश कुमार सराठे

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

चिमनी

बचपन का मित्र

हे भगवान बनवा दो पटवारी