निराशा
जब घोर निराशा छा जाये
पथ भी काटों से भर जाये
जब राह दिखाई न देती हो
पथ भटकाने वाले उस पथ में
तब हो सवार बढ़ जाना
आशाओं के अविरल रथ में
ऐसा दिन एक दिन आता है
पथ भी राही को भटकाता है
अगर संभल गया जो भी इसपल
गर बढ़ता रहा नदी की भाती अविरल
ऐसे बढ़ने बाला ही तो आगे चलकर
अपने लक्ष्यों तक चल पाता है
जब कभी उद्देश्य प्राति में
कैसा भी रोड़ा आ जाये
चाहे मार्ग कही उलझॉ हो
चाहत यमराज खड़ा हो राहों में तब अपने मन में दृढ़ता लेकर
बढ़ जाना उस विकट विपत में
आत्मदृढ़ता का शूल पकड़कर बाहों में
गीतकार
दुर्गेश कुमार सराठे
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