मैं भारत का सूरज हूँ।
मैंभारत का सूरज हूँ,
अंधयारे से डरता हूँ।
बांध रखा है तम ने मुझको,
भय से रोज विचरता हूँ।
जकड़ रखे हैं पाँव किसी ने,कहीं कलाई बौनी है।जिह्वा पर है जोर किसी का,काटों की कहीं बिछौनी है।क्रंदन करती मेरी किरणें,धूप दर्द की वाहक है।नहीं मिटेगा अंध यहाँ का,जिसका पुंज सहायक है।बैंसे भी तो कम दिखता हूँ,ऊपर से बादल छा जाते हैं।डसने पंथ कौम ओ जाति,हर दिन शोर मचाते हैं।कैंसे मुझको पूजा जाये,बिवस बहुत लाचार बड़ा।स्वयं के हाथों फिरसे स्वयं से,खुद का ही संहार खड़ा।दुर्गेश कुमार सजलउच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान भोपाल
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