कविता

चोर सुतों की ऐंसी तैसी,
लूट रहे नित नये खजाने |
सच कहने में जीभ हकलती,
चुप बैठे कई जाने माने |

सज्जनता के साधू बनकर,
चर चर सेठ हुए सब चरकर |
मातृभूमि तक चबा गए वह,
सारे ऐसे  चोर चिनरकर|

नहीं कलम पर बंदिश कोई,
ना मैं चुप रहने वाला|
चोरों को तो चोर कहूँगा,
नहीं रुकेगा लिखने वाला|

दुर्गेश कुमार सराठे 'सजल'
पुरैना कलाँ बनखेड़ी मध्यप्रदेश
8819930876

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