कविता

रूठे-रूठे ना घूमों तुम|
तम के गम को ना चूमों तुम|
रात बहुत प्रबल है|
मैं हूँ आज,कहाँ फिर कल है?
चारों ओर निशा के रथ में|
घूम रहा छल हर इक पथ में|
लिये अहम अपने मन में|
तुम इतना ना इतराओ|
टेड़े-मेड़े चाँद तनिक,
छत पर तो आओ|

पता नहीं क्या मन में ठानी|
करते हो तुम आना कानी|
बीत रही है विभावरी भी|
आने को है दिन का पहरी|
तर्क तर्क में यूँ ना बैठो|
ऐसे मन में तुम ना ऐंठो|
तम का भी दिल होता है|
उसको ऐसे ना ठुकराओ|
टेड़े-मेड़े चाँद तनिक,
छत पर तो आओ|

कभी यहाँ भी रखो कदम|
बैठ ना जाये उर में गम|
सूख ना जाये उर का कानन|
फैल रहा है गम का आनन|
घात नहीं अब करना तुम|
अब तो पग सीधे धरना तुम|
स्नेह युक्त यह जहर प्याला|
अब तो नहीं पिलाओ|
टेड़े-मेड़े चाँद तनिक,
छत पर तो आओ|

दुर्गेश कुमार सजल

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