कविता

हम तो काँटे हैं

आश्रय देता जो भी हमको,
दर्द उसी को दे जाते|
रौंदे या  स्नेह करें,
हम लहू तो उसका पी जाते|
जब तक रहते पुष्प संग में,
अवरोधी ही कहलाते|
काँटों को कब प्यार मिला,
रहे सदा पराये है|
काँटे हैं साहब
कब किसके हो पाए हैं|

कोमलता का बक्ष तोड़ते,
तब तो शूल कहाते हैं|
देख हमारी लाचारी को,
फूल सदा इठलाते हैं|
धोखा फूलों से मिलता है,
हम तो धोखा खाते हैं|
औरों के रक्षण हेतु,
बली चढ़ाये जाते हैं|
आज हमारे हृदय में भी,
फूलों ने शूल चलाये हैं|
काँटे हैं साहब,
कब किसके हो पाए हैं|

हर दम दिल को ठेस लगी,
ठोकर ने ठोकर मारी है|
लैकिन फिर भी औ रक्षण का,
प्रण हमारा जारी है|
पल पल कर रोये हैं,
दुनिया यही हमारी है|
व्यथा हमारी ऐसी हो गई,
ज्यों चोरों की नारी है|
करूण व्यथा को,
लटक झटक कर,
अधरों तक ले आये हैं|
काँटे हैं साहब,
कब किसके हो पाए हैं|

दुर्गेश कुमार सजल

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