कविता

मन चिंतित था
पर चिंता...
कोई तीव्र नहीं..
वह तो एक..
तृण तंतु सम
एक झकोरे से..
उड़ जाती है|
मन के क्षितिज में|

जब कभी...
चिंता उतर जाती है|
हृदयतल के
तीव्र भंवर में..
लगता है|
कोई नदी सूख गई..
जल के प्रभाव में..

सजल होकर..
प्यास बुझाने में,
असमर्थ हो गई हो|

मगर इसी पल
एक आशा
नवांकुर लेकर..
दिल के किसी कोने में..
मीठी शीतल बयार होकर|
उछल जाती है|
और चिंता का ज्वर..
शांत कहीं विसर्जित हो जाती है|

दुर्गेश कुमार सजल

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