कविता
जिसके कंधे पर सर रख पाते
अपने हृदय की व्यथा सुनाते
ऐसा कोई अपना भी तो होता
जिसको हम अपना कह पाते
जिससे होती मीठी मीठी बाते
जिसकी यादों में कटती रातें
जिससे कभी झगड़ भी पाते
लड़ते भी पर फिर मिल जाते
जिसको लिखते खत ओ पाती
धड़कन जिसको पल पल गाती
कुह कोयल जिसके गीत सुनाती
रटते लिखते रात सुबह हो जाती
जिसपर कभी गजल हम लिखते
कोई कविता मुक्तक दोहा लिखते
जिसको सदा हृदय में हम रखते
जिसपर छंदमयी पुस्तक लिखते
दुर्गेश कुमार सराठे
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