कविता

*कविता*

कविता के प्राण
तुम कहाँ हो?
दिखते ही नहीं,
आज कल|
क्या बेसुध हो?
या कहीं,,,,|
किसी आश्रय की बाँहों में,
स्वयं को समर्पित कर दिए हो|

पर जो भी हो,
तुम से मिलने का मन है|
मगर..
तुम,ना जाने...
किस संगत में व्यस्त हो|
भुला बैठे क्या मुझे?
या फिर,,,.
कोई मजबूरी है बड़ी सी..,

तुम में यह,बदलाब है,
या बेपर्दा हुए हो?
कहो तो कुछ,,,|
या की कहना नहीं चाहते!
कल तक को मित्र थे मेरे..
आज इतने निष्ठुर..|
क्या यही सत्य है?
तुम्हारा|

दुर्गेश कुमार *सजल*

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