कविता

किसको अपनी व्यथा बतायें?
किससे कह दें दिल का रोना?
भर  भादों  सा  टपक रहा है,
मन की छत का कोना कोना|
लैकिन फिर भी सीख चुका हूँ,
विचलित नहीं मुझे अब होना|

पर्वत   पर्वत   पीर   शिखर  है|
डर  को  भी लगता वहाँ डर है|
मौत  कठिन  जीवन बहतर है|
उड़ना है लैकिन पास न पर है|
पैरों जमीं और ना छत ऊपर है|
लैकिन मेरा मन खुशियों तर है|

किस किस ने यहाँ शूल दिए हैं?
किन काँटों ने कब फूल दिए हैं?
और  ढूबते  तिनके  से  तृण को,
किस नाविक ने यहाँ कूल दिए हैं?
इन सब तत्वों  तालमेल है जीवन,
दिन  रात  कहाँ  अनुकूल दिए हैं?

दुर्गेश कुमार "सजल"

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