छोड़ निकलना धारों को
नहीं किसी से कहना कुछ भी,
करनी नहीं किसी से बात|
हँसकर बोझ उठायेंगे,
समय ने दी है जो सौगात|
घात लगाये बैठे कुछ तो,
कहीं कटारैं पैनी हैं|
मुझे पता है कौन कहाँ है,
नहीं किसी से कहनी है|
नदी के संग में चलते जा,
ओढ़ो नहीं किनारों को|
अगर जरूरत पड़ जाये तो,
छोड़ निकलना धारों को|
दुर्गेश कुमार सराठे सजल
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