सूख चुके कुम्हलाये मन में
सूख चुके कुम्हलाये मन में,
कैंसे अब तरूणाई आये|
लहू लुहान हो वक्ष हृदय का,
फिर कैंसे करूणाई छाये|
दीपशिखा के जलते मन में,
ढूब गया नवतारा|
किरणपुंज को आहत करके,
नाच रहा अंधयारा|
रोती बहुत विलखती फिरती,
हृदय के भीतर ममता|
बाहर भीतर दोष भरे अब,
कुंद हुई सब क्षमता|
ना तो यहाँ पर मित्र बचे अब,
ना उसकी परिभाषा|
दो जीभों के मध्य फसी है|
एक हमारी भाषा|
रोते रोते खींच चला है,
कवि का मन इक रेखा|
वह छंदों में टीप दिया है,
जो उसने यहाँ देखा|
दुर्गेश कुमार सजल
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