प्रेमालय
तुमसे मिलने को आतुर हो,
त्व नयनों को पढ़ने आया हूँ|
कुछ शब्दों के मोती लेकर,
प्रेमालय गढ़ने आया हूँ|
जहाँ ना कोई पूजालय है,
ना दीपक है ना बाती|
प्रेम हृदय में बसा रखा है,
उसकी ज्वाला गहराती|
प्रेम नीर से ही है बंदन,
प्रेम पुष्प की माला है|
प्रेम प्रेम का आलिंगन है,
औढ़ी प्रेम दुसाला है|
छवि तुम्हारी देव तुल्य है,
नयनों का संवाद है|
कहने को तो बिंधप्यारी है,
पर अर्चन का अपवाद है|
प्रेमालय की देवी हो तुम,
प्रेमवटी की आली|
बिना तुम्हारे भ्रमर रंजन,
प्रेमवाटिका खाली|
प्रेमालय की देवी बनकर,
आओ हरपल गीतों में|
श्वास श्वास में बस जाओ तुम,
छा जाओ मनमीतों में|
दुर्गेश कुमार सराठे सजल
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