भौत कछु डूबो डरो कल्ल की रात में
कविता रो परी आज,
भुन्सारे भुन्सारे......
दिनूगो तो हो गओ|
मनों भौत कछु डूबो डरो है|
कल्ल की रात में|
चिरैयों की चीं चीं..
भैरानी-भैरानी फिरत है|
सूरज विचारो.....
डुकरिया के पल्ले में,
मो लुकाय लुकाय फिर रओ है|
फागुन अब तक,
फूँस की ओली में बैठो है|
गलियारे बिना खड़ेरा के...
ऊँग रय हैं|
और खड़ेरा बी विचारो,
राहड़ की खाड़ी ढूढ रओ है|
रूख राई,....
सन्नाने-भन्नाने लग रय हैं|
दतोन नाँद न्यारे हो गए|
ऐसो लग रओ है|
सबरे दिन के संगे डूब गए|
दुर्गेश कुमार सराठे सजल
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