बसंत सुनो तो
अरे बसंत,..
सुनो जरा़......|
क्या?
मानव की छाया पड़ गई,
तुम पर|
जो तुम भी,
भर उठे, धूर्तता से लबालब|
सुनो जरा़......|
क्या?
मानव की छाया पड़ गई,
तुम पर|
जो तुम भी,
भर उठे, धूर्तता से लबालब|
करने लगे हो,
छल|
हाड़ माँस के पुतले जैंसे|
या फिर,
बदल गया स्वभाव तुम्हारा|
कुछ तो बात है|
अब कह भी दो,यार|
या फिर समझ लें हम ही|
छल|
हाड़ माँस के पुतले जैंसे|
या फिर,
बदल गया स्वभाव तुम्हारा|
कुछ तो बात है|
अब कह भी दो,यार|
या फिर समझ लें हम ही|
पतझड़ तो दिखा था|
तुम ही नहीं दिख रहे आजकल|
शब्द खोजते हैं,
अकुला कर|
आँखे अलसा गई हैं|
राह जोहते जोहते|
तुम ही नहीं दिख रहे आजकल|
शब्द खोजते हैं,
अकुला कर|
आँखे अलसा गई हैं|
राह जोहते जोहते|
तितलियों को भी,
शिकायत है तुमसे|
भँवरे रो रहे हैं|
तुम्हें ना पाकर|
सारा उपवन,तड़प रहा है|
गले लगाने तुमको|
कलम मचल रही है,
तुमसे लिपटने|
शिकायत है तुमसे|
भँवरे रो रहे हैं|
तुम्हें ना पाकर|
सारा उपवन,तड़प रहा है|
गले लगाने तुमको|
कलम मचल रही है,
तुमसे लिपटने|
दोस्त,
कुछ तो लिहाज रखो|
दोस्ती की.......|
कुछ तो लिहाज रखो|
दोस्ती की.......|
दुर्गेश कुमार सजल
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