बैचैन बहुत हूँ

कविता

बैचैन बहुत हूँ,
दिल घबराया है|
लगता है मन के ऊपर,
घोर तिमिर का साया है|

अंधकार डसने को आतुर,
पुंज हृदय का खोया है|
घोर निराशा जागी जागी,
आशा का सूरज सोया है|

नींद माँगते नयन हमारे,
जागा लैकिन मन है|
साँसे जैंसे रुकने को हैं,
टूट रही अब धड़कन है|

सजल चाहकर रो ना पाता,
लैकिन लोचन बहुत सजल है|
नदीं में जैंसे रेत बची हो,
दूर-दूर तक कहीं ना जल है|

घुटन बहुत है दिल के भीतर,
लगता है सब थम जायेगा|
मैं भी सायद मिट जाऊंगा,
कुछ भी  रह  ना पायेगा|

दुर्गेश कुमार सराठे सजल

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