कविता

बढ़ी तपन है जीवन वन में,
सूख गई कोमल फुलवारी|
इच्छाएं हर पल मरती जाती,
मची    हुई   है   मारा-मारी|

पुष्प हुए अब छलिये सारे,
उर के भीतर भरा कपट है|
मानवता का ह्रास हुआ है,
नैतिकता   सब  चौपट  है|

ग्रसने को आतुर समय पिपासा,
तृष्णा       शोर     मचाती   है|
मन  की   वेदी  शून्य  पड़ी है,
आकुल  हो कर  हकलाती  है|

भाव पड़े सब प्रशीतन में,
अहम   सदा  गरमाया है|
गेंगे  सारे  कोयल हो गए,
मधु  का  नीड़  हिराया है|

मगर ना थकना ए मन मेरे,
तुझे कसम बलिदानों की|
तुझको लाज बचानी अब,
पौरूष   के   पैमानों  की|

दुर्गेश कुमार सराठे सजल

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