पैर का जूता

आज एक सज्जन को जूते हाथ में लिये देखा तब सोचा आखिर जूता भी कोई हाथ में रखने की चीज है| लगता है सनक गया है| या दिमाग खराब है इसका,जो जूते हाथ में लेकर घूम रहा है| अब जूते हाथ में लिए है इस कारण उसे पागल कहना अनुचित है| पर कोई तो बात है जो वह जूते हाथ में लेकर घूम रहा है| तभी अचानक ध्यान गया कि यह तो अच्छा है कि उसने जूतों को सर पर नहीं रखा है,वरना ऐसे लोगों की कमी भी नहीं है जो जूतों को सर पर लेकर ही घूमते हैं,और उन्हें इस बात का तनिक भी भान नहीं होता है| बल्कि वह तो सीना फैलाय घूमते हैं, अब वह तो फिर भी हाथ में लेकर घूम रहा है वह कोई पागल नहीं हो सकता, जूते हाथ में लेना कोई पागल होने की निशानी थोड़े है| पागल तो उन्हें तब समझते जब वह जूतों को सर पर लेकर घूमता,मगर उसने तो हाथ में रखे हुए हैं| और जूतों को हाथ में लेने और सर पर रखने में बड़ा अंतर होता है| जूते हाथ में रखना कभी-कभी बचाव भी कर सकते हैं| जूते सर पर रखने वालों और किसी सर पर रखे हुए जूतों से,खैर जूता है ही ऐसी बस्तु जिसे पैरों में पहनने के लिए बनाया गया है| जोकि पैरों को सुरक्षा प्रदान करते है| और फिर जूतों का काम ही होता है धूल, काँटों, कंकड़ों से पैरों की सुरक्षा मगर कुछ लोग जूते हाथ में  रख लेते हैं कुछ तो यह मर्यादा भी भूल जाते हैं| और जूतों को अपने पैरों की जगह अपने शीश पर रख लेते हैं और उन्हें इसकी तनिक भी लज्जा नहीं आती, उल्टे वह तो जूतों को और घमण्डी बना देते हैं, और जूते भी अपने आप को बहुत उच्च समझने लगते हैं| अब शीश पर जो लगे हुए हैं,पर जूते तो जूते होते हैं| जब कभी पैर में पहने वालों से सामना होता है तो शीश पर चढ़े जूते बिलबिला उठते हैं| मगर जिसकी जो जगह होती है वह वहाँ पहुँच ही जाता है| और पैरों में पहने हुए जूतों को देखकर शीश पर धारण करने वाला तुरंत समझ जाता है और वह फौरन अपने शीश से जूतेश्वर को उठाकर चरणों में पटक देता है, क्योंकि अब उसे पता चल चुका होता है कि जूते को पैरों में ही पहनना चाहिए वह शीश पर धारण करने योग्य नहीं हैं| हाँ कभी कभार हाथ में उठा लेने में कोई दिक्कत नहीं यह तो रक्षण का लिए किया जाता है| हाँ मगर शीश  पर धारण नहीं किया जा सकता है,कुछ लोग जूते के जैंसे ही होते हैं|..........|

दुर्गेश कुमार सराठे

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