पाती

आज जब मैं वर्तमान को देखता हूं तो बहुत ही मधुर फल मेरे नव प्रयाण के मार्ग में स्नेहा वादक बनकर प्रेम पाहन हो राह रोकने लगते हैं यह क्रिया शायद हर सरल हृदई व्यक्ति के साथ होती है किंतु मैं बहुत ही भावुक हूं और भावनाएं होती ही है नीर युक्त शीघ्र नयन सजल हो उठते हैं सब कुछ बिछड़ता सोचकर मगर समय का स्वभाव चरैवेति चरैवेति को मूल में धरता है एक जगह नहीं रुक सकता मगर मेरा ह्रदय चाहता है की बैंक वालों को सदैव के लिए रोक लूं या फिर स्वयं अचल हो इन्हीं पलों में चिरस्थायी हो जाऊं लैकिन यह  इतना सरल नहीं है| और ना ही कभी सम्भव होगा|

अगर इन पलों को रोका जा सकता तो शायद मैं सदैव के लिए रुक लेने में ही अपनी सारी शक्ति लगा देता लेकिन इन्हें रोकने की कल्पना ही की जा सकती है वास्तविकता इससे उलट है आज मन इतना उतावला हो उठा है की शब्दों के द्वारा व्यक्त करना कठिन प्रतीत होता है मैं कुछ दिनों बाद में अपने घर वापस जा रहा हूं अब बस 5 दिनों का समय ही मेरे पास है उसके बाद मुझे यहां से पलायन करना है केवल मैं ही नहीं अभी तू मेरे विचार मेरी क्रियाकलाप 5 दिन हो आप पलायन करने के लिए विवश जान पड़ते है हां मन में घर जाने की खुशी बहुत है लेकिन उससे कहीं ज्यादा अपने मित्रों से बिछड़ने  का दुख  मन में  व्याप्त है ना जाने  क्यों घर वापसी का विचार हृदय के तल में हर्ष का संचार नहीं कर पा रहा है मन जितना घर जाने की सोचकर हर्षित नहीं है उससे कहीं ज्यादा पलायन की बात से व्यथित हैं|

और होना भी स्वाभाविक है मुझे इतना प्रेम अपनापन जो मिला है इस जगह पर की एक अलग ही दिलीय लगाव हो गया है| इस जगह से इस जगह के मित्रों से एक अदृश्य प्रेम की डोर मन को बाँधे जा रही है|

मन में रह रहकर वर्तमान के कुछ दृश्य  जो इतिहास होने वाले हैं,हृदय को व्यथित कर रहे हैं| वे दृश्य भी इतिहास नहीं बनना चाहते हैं|

हाँ मगर वर्तमान का इतिहास होना भी जरूरी है, तभी तो भविष्य का जन्म होगा और पुनः वर्तमान वृद्धि करेगा किंतु जब वर्तमान प्रेमरस से सराबोर हो गया हो तो वह भविष्य को ना आने का अाग्रह अवश्य करने लगता है किंतु काल का कपाल इन सभी इच्छाओं के बलबूते अपना कार्य संपादित नहीं करता है|

वह तो अपनी गति से चलता रहता है,उसे किसी के आने-जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता है| आज भी वह अपनी धुन में चला जा रहा है|
मुझे भी तो उसके संग ही चलना है और मैं भी दुखी मन से उसका सहगामी बन ही रहा हूँ,किंतु मैं अपने साथ वर्तमान को भी स्मृतिचिह्न बनाकर ले जा रहा हूँ,उसे अकेला नहीं छोड़ रहा हूँ|

मैं चाहता हूँ वर्तमान के साथ और कुछ दिनों तक बसर करूँ पर भविष्य द्वार पर सांकल खट-खटा रहा है,उससे भी नहीं बचा जा सकता है, उसके साथ ही फिर बसर होना है

मगर वर्तमान से प्रत्यक्ष बिछुड़न का दुःख आँखें अवश्य सजल किए जा रहा है| उसके सारे क्रियाकलाप बार बार स्मृति पटल पर आ आ कर हृदय को और पीड़ा दिए जा रहे हैं| कभी कभी लगता है अब कैंसे रह पाऊंगा.....|

इसमें कुछ दृश्य तो ऐसे है पूरे जीवन भर नहीं विसराये जा सकते और ना ही कभी विसराना चाहता हूं इस वर्तमान ने मुझे बहुत अच्छे अनुभव दिए है  श्रेष्ठ मित्र इसी वर्तमान की देन हैं|

आज जब उन मित्रों से बिछुड़ने का विचार मन में आता है तो हृदय दुःख से विलख पड़ता है| आज मुझे आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मित्रता निबंध स्वतः स्मृत हो जाता है, श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रगाथा प्रासंगिक जान पड़ती है| और  हो भी क्यों ना मैं भी तो अपने मित्रों से बिछुड़ने वाला हूँ|

सच पूछिए तो आज जिस का अनुभव मुझे हो रहा है वह मेरे लिए सर्वथा नवीन है हां किंतु इससे पहले भी एक दो बार हुआ होगा परंतु तब ना मित्रता की परिभाषा बताते और ना मित्र का मतलब पर आज इनसे अनभिज्ञ नहीं हूं शायद इसीलिए मुझे अपनी वापसी से अधिक बिछड़ने का दुख हो रहा है मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतने कम समय में ऐसे मैत्रीय बंध लगने वाले हैं जिनसे छूटना तो असंभव है किंतु थोड़े समय के लिए भी बिछुड़ना इतना दुःखप्रद होगा|

मेरे ज्यादा मित्र नहीं है बस कुछ एक दो मित्र ही हैं पर मित्र हैं| शायद इसीलिए उन से बिछड़ने का दुख इतना अधिक है

कलम भी आज बिना रुके हृदयकी अनुगामनी बनी चली जा रही है| हर भाव को कागज पर उतार देना चाहती है|
आज मैं अपने सबसे प्रिय मित्र एवं मंडीदीप के पहले मित्र रौशन से भी पाँच दिनों बाद बिछुड़ने वाला हूँ, वह मेरे कॉलेज का मित्र नहीं है और ना ही किसी स्वार्थ साधना की पूर्ति के लिए मित्र बना है| बस एक दो बार मिले और मित्रता के सूत्र में बँध गए| हमें एक दूसरे से किसी भी तरह की स्वार्थ साधना का लोभ नहीं था|
हमारी एक दूसरे से पहली बार यूँ ही अनायास मुलाकात हुई थी एक भवन निर्माण स्थल पर, लैकिन हमें क्या पता था कि यहाँ से मित्रता का भवन भी निर्मित हो जाएगा|
तब तो उसका नाम भी नहीं जानता था हाँ एक लड़के से जरूर कुछ बात-चीत हुई थी पर इससे तो राम राम तक ही सीमितता रही|

इसके बाद कभी एक साथ इन सबसे मिलना नहीं हो पाया|  सात आठ महीने गुजर गए मैं मंडीदीप में आया और चला गया किंतु तब तक सब सामान्य ही था|

एक दिन मेरे एक मित्र के साथ कॉलोनी के गणेशोत्सव में सम्मिलित होने के लिए गया वहाँ मुझे रौशन फिर मिला मुझसे हाथ मिलाया पर में पहचान ही नहीं पाया| ऐसे ही एक दो बार गणेशोत्सव में ही मिला पर अभी तक नाम भी पता नहीं था|
एक दिन फिर मंदिर में उससे मुलाकात हुई यहीं से सम्पर्क थोड़ा अधिक हो गया एक दूसरे के मोबाइल नम्बरों का आदान-प्रदान भी इसी समय हुआ|

इसके बाद समय अपनी गति से दौड़ता रहा और हम इतने घनिष्ठ मित्र कब बन गए पता ही नहीं चला|

कभी-कभार  का मिलना जुलना इतनी घनिष्ठता उत्पन्न कर गया, हम अधिकतर रविवार को शाम के समय दाहोद रोड पर टहलने निकल जाया करते,यह क्रम दो तीन महीने चलता रहा| और फिर कभी कभी सुबह शाम मुलाकात हो जाया करती थी|

कुछ समय तक ऐसा चलता रहा मगर कुछ दिनों के बाद मित्रता का बंधन और प्रगाढ़ हो गया |अब हर दिन शाम को साथ में टहलने जाना दिनचर्या में शामिल हो गया|

सुबह सुबह भी टहलना अधिकतर होता है,पर मैं कई बार शाखा लगाने के कारण नहीं जा पाता था किंतु शाखा में मुलाकात अवश्य हो जाती थी|

हम शाम को अधिकतर साथ साथ घूमते दूर तक निकल जाते थे, वार्तालाप भी इतना कि समय कब फिसला पता ही नहीं|
कभी कभार वैचारिक मुठभेड़ भी हो जाती थी यह अक्सर होने वाली घटना विधि है|

जब इन सब बातों की ओर ध्यान आकर्षित होता है तो हृदय रुदन करने लगता है,अब इन क्रियाकलापों पर पूर्णविराम लगने वाला है| यह सारी यादें केवल स्मृति पटल तक सिमट कर रह जायेंगी| मैं अपने घर बापस जाने वाला हूँ|

अब सब कुछ छूटने वाला है,यह वातावरण मित्र और सारे क्रियाकलाप,साथ रहेंगी तो बस स्मृतियाँ, जो कभी दाहोद रोड पर वितायी शामों में निहित हैं तो कभी शाखा प्रांगण के सूर्यनमस्कार एवं दण्डप्रहार अभ्यास में|

कई बार मेरे द्वारा फोन ना उठा पाने के कारण प्राप्त उलाहना अपने भीतर बहुत कुछ समेटे हुए रहता है| यह सब घटना क्रम बार बार स्मृति में कौंध रहा है|
मगर बापसी होना भी आवश्यक है आज यहाँ से कल वहाँ से|

दुर्गेश कुमार सजल

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