त्याग तपस्या की भूमि में
त्याग तपस्या की भूमि में,
नित दीपक सा जलना होगा|
राहें होंगी खरी खरी सी,
लैकिन पथ पर चलना होगा|
मन को छोटा करने वाले,
कुछ तो तरूओं से सीखो|
मौन साधकर बहता नद है,
यूँ कष्टों से ना चीखो|
सह पाहन के आघातों को,
ना नयन नदी के रोये हैं|
भू ने बिजली के आघातों को,
हँस कर खूब संजोये हैं|
पाहन पाहन पद चापों से,
राहें सृजन कर डालो|
जो भी पथ में रोक रहा है,
तुरत बिसर्जन कर डालो|
दुर्गेश कुमार सराठे सजल
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