आज का युवा

आज का युवा फैसन में ऐसा खोया है,
पता नहीं जागा है कि सोया है
पाश्चात्य संस्कृति को आदर्श मानकर,
अश्लीलता को  सभ्य जानकर
इस मृगतृष्णा सी अंधी बाहकता में
न जाने क्यों अंधों सा खोया है
पता नहीं जागा है कि सोया है

न जाने क्यों इस बाहकता में बहता है
औरों के कहने पर
चोटें अपने तन पर सहता है
सब जान समझ कर भी
न जाने क्यों, अनजान बना सा रहता है
अब तो छोड़ो हमे लड़ाना भावुकता से
न जाने ऐसा क्यों न कहता है
न जाने क्यों लोगों के भड़काने पर
हिंसा को तत्पर रहता है

हमें लड़ाने वाले अपना हित साधा करते हैं
वे तो बैठे हैं वातानुकूलित कमरों में
और युवाओ को यूं ही उलझाया करते हैं
अब तो जागो भारत माँ के वीरों
भारत माँ खतरे में है
जड़ सहित उखाड़ना है अब हमें
जो हमें लड़ाया करते हैं

रचियेता
दुर्गेश कुमार सराठे

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

चिमनी

बचपन का मित्र

हे भगवान बनवा दो पटवारी