वह जीवन ही क्या
वह जीवन ही क्या जिसमें,
जख्मों का अंबार नहीं|
जिस दिल में बासना नर्तन करती हो,
उस दिल में सच्चे वाला प्यार नहीं|
जिसे देख पुलकित न हो उर,
ऐसा भी कोई श्रृंगार नहीं|
जो मिटा न पाये अंतर मन के तम को,
वह घोर तिमिर है अंगार नहीं|
जो हटा न पाये हृदय के दोषों को,
वह एक छलावा हो सकता है प्यार नहीं|
रचियेता
दुर्गेश कुमार सराठे
वाह
ReplyDeleteउत्तम रचना
ReplyDeleteThank you Bhai
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