मरता बचपन
मैंने देखा जब एक बार,
बचपन मरता धुआँधार |
छूट गई विद्या अध्ययन की बेला,
बचपन कार्य कर रहा अकेला|
जहाँ इस पल में बालक विद्यालय को जायें,
बहां वह बचपन भैस चराये|
हाय भाग्य तेरी यह लीला कैसी,
कर डाली तूने बचपन की ऐसी-तैसी|
क्या कसूर था उस बालक का,
जिसका तूने बचपन छीना,
मिट्टी में मिला दिया तूने,
काल उभरता एक नगीना|
अगर कहीं बच पाते उसके यह स्वर्णिम पल,
हो सकता था कोई बहादुर होता वह भी कल|
अगर कहीं वह भी विद्यालय जाता,
तब निश्चित ही कुछ कर पाता|
अगर कहीं वह कुछ न बन पाता,
तब कम से कम गंवार तो न कहलाता|
उसने भी तो कई सपने देखें होंगे,
उसके भी कुछ अरमा अपने होंगे|
पर भाग्य तेरा यह करतब कैसा,
कुछ न हुआ सोचा होगा उसने बैंसा|
उसके कितने सपने टूटे होगे,
कितने अरमा फूटे होंगे|
रे भाग्य कुछ पल ही तो मांगे होंगे उसने,
तू चला आया उनको भी ग्रसने|
रे भाग्य छोटी सी बिनती है मेरी,
क्रियाविधि बदल अब तो तेरी|
ऐसे किसी के सपनों को न तोड़ाकर,
सब कुछ न छोड़े तो कम से कम बचपन को तो छोड़ाकर|
बचपन ही वह पल होता है,
जहाँ भविष्य अटल होता है|
बचपन ही तो सब कमियों को भरता है,
भावी इमारत की नींव पटल पर धरता है|
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