प्रेमी का अपनी प्रेमिका के नाम संदेश

न तेरा कसूर है,
न मेरा कसूर है|
मैं तुझसे दूर हूं,
तू मुझसे दूर है|
यह दूरिया होना तो,
कुदरत का दस्तूर है|
न मैंने चाहा था यह,
न तूने चाहा होगा|
वही होगा जो,
उसने लिक्खा होगा|
पर बिछुड़ गए इससे,
बिरह की तड़पन जरूर है|
पर यह तो कुदरत का दस्तूर है|
ऐसा नहीं की हमने,
तुम्हें न याद किया हो|
बिन तुम्हारी याद किये,
एक पल भी कहीं जिया हो|
हम न मिल पाये,
ऐसी मन में कसक जरूर है|
पर यह तो कुदरत का दस्तूर है|
क्या केवल तुम ही,
इस बिरह में व्यथित रहीं|
हम भी तो रोये थे,
तुम्हें न पाकर निकट कहीं|
तुमने तो हमें यूं आवाद किया,
पर हमने भी तुम्हें कहां बर्बाद किया|
तुमने बिरह में अश्रुधार बहाये,
तब हमने भी बिरह को कविता गीत बनाये|
पर तुम्हें यूं व्यथित देखकर,
मेरा मन भी दुख से भरपूर है|
पर यह तो कुदरत का दस्तूर है|
हमें यूं निष्ठुर नहीं समझ लेना,
जो दिल में हो वह गीतों में कह देना|
हमने दर्द तुम्हारा ,
मन पर खूब सहा है|
तुम्हें भुलाने पर भी,
स्मरण तुमरा खूब रहा है|
हम भी तुमसे दूरी पाकर,
न मिलने को मजबूर हैं|
पर यह तो कुदरत का दस्तूर है||
📖रचियेता📖
दुर्गेश कुमार सराठे

Comments

Popular posts from this blog

चिमनी

बचपन का मित्र

हे भगवान बनवा दो पटवारी