अरे पहले स्वयं तो बदलो
अरे पहले स्वयं तो बदलो
दुनिया फिर स्वयं बदलती जायेगी
पहले तुम रसखान बनो
सारी दुनिया परिवार नजर में आयेगी
तुलसी के तुम दोहे बनकर तो देखो
मीरा के पद में घुलकर तो देखो
सारी श्रृृष्टि परिवार नजर में आयेगी
पहले स्वयं तो बदलो
दुनिया स्वयं बदलती जायेगी
कवियों में रसखान वनो तुम
गीता के सोपान बनो तुम
अपने मात-पिता के आँखों के तारे बन
श्रवण सा सम्मान बनो तुम
प्रकृति के बहुत चितेरे सुमित्रानंदन बन
पद्य काव्य के मान बनो तुम
फिर देखो दुनिया परिवार नजर में आयेगी
अरे पहले स्वयं तो बदलो
दुनिया फिर स्वयं बदलती जायेगी
घनानंद के विरही गीत बनो तुम
अपने प्रिय के सच्ची प्रीत बनो तुम
किसी बिना गिराये आगे बढ़ना
ऐसी बाली जीत बनो तुम
कवियों वाली बस्ती में आकर तो देखो
दुनिया सतरंग नजर में आयेगी
अरे पहले स्वयं तो बदलो
दुनिया स्वयं बदलती जायेगी
दुर्गेश कुमार सराठे
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