प्रेम होवे तो घनानंद सम
प्रेम होवे तो घनानंद सम,
हर पद में सुजान नाम लीन्हो है|
महिमा बढ़ाई है सनेह की,
प्रेम को पूजा सिध्द कीन्हो है|
सनेह को गंगा की निर्मल धार दी,
केवल सुजान को `स्वजान' सम कीन्हो है|
सुजान को स्वजान मान,
प्रभु के नाम सम सुजान रट लीन्हो है|
पीछे छोड़ सारे जग मोह को,
सम्पूर्णन जग में सुजान-सुजान बस चीन्हो है|
हर क्षण स्मृति में सुजान बसे,
उर में सुजान-सुजान भर दीन्हो है|
श्रावण की फुहार में सुजान नाम लिया,
तपती जेठ की दोपहिया में भी सुजान याद आई है|
उर की हर धमकियों में ऐसा शुध्द रक्त नहीं,
जहाँ सुजान न समाई है|
सुजान से ऐसी प्रीत लगाई थी उनने की,
समस्त काव्य में सुजान बस सुजान ही समाई है|
ऐसा अद्वितीय प्रेम न होगा जग में,
जहाँ वियोग में भी सुजान सागर सी कृति ये बनाई है|
वर्तमान में न मैंने देखा ऐसा प्रेम,
जहाँ प्रेम आराधना की धूनी ये रमाई है|
वास्तव में घनानंद का प्रेम पूजा से कम नहीं,
इनने प्रेम की गंगा अविरल ये बहाई है|
गीतकार
दुर्गेश कुमार सराठे
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