पता नहीं अब कहाँ हैं
बह बचपन के मधुर पल
बचपन में खूब मचाया बह कोलाहल
नादानी में किये ऊधम अविरल
इन्हें याद कर मन मेरा भी है यूँ उत्कल
यह सब न जाने कहाँ गए हैं
पता नहीं अब कहाँ हैं
बचपन के मेरे बह स्वर्णिम पल
बह बचपन का मित्र
अकारण ही बना दिया करते थे बह चित्र
पता नहीं अब किते हिरा गये
बचपन के बह सब क्रियाचरित्र
पता नहीं अब कहाँ हैं
लड़ने वाले बचपन के बह मित्र
बचपन के मित्रों में
माना समझ नहीं होती थी
लैकिन उन मित्रों के भीतर
निश्छलता खूब भरी होती थी
सुबह लड़ते भी थे तो
दोपहर तक फिर संधि हो जाती थी
किसी भी बात को लेकर
दो घंटे में ही रजामंदी हो जाती थी
पता नहीं अब कहाँ हैं
बह मित्र जिनके कारण यह चुरफंदी हो जाती थी
आपका अपना
दुर्गेश कुमार सराठे
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