कैसा पिछड़ा देश रे
अब कैसा पिछड़ा देश रे,
अब कैसा विखरा देश रे|
जहाँ बसते थे सारस से पक्षी,
सिंहो से उज्जवल थी यह धरती|
नदियों की कल-कल करती गर्ती,
गाँवों की वह तन्मय परती,
कुछ भी रहा न शेष रे,
कैसा विखरा देश रे|
गाँव से आँगन कहाँ हिरा गये,
जंगल को हम मानव खा गये|
कहाँ गया नदियों का वह देश रे,
कैसा विखरा देश रे|
नदियाँ भी अब प्रदूषित हो गईं,
नदियों की ममता अब सब खो गई|
विकल हुआ नदियों का यह देश रे,
कैसा विखरा देश रे|
कुर्ता-धोती की पोशाक कहाँ है,
किस्सों में कटती वह रात कहाँ है|
कहाँ गई पनही सी पदवेश रे,
कैसा बिखरा देश रे|
कहाँ गई प्रिय की मीठी बोली,
प्रिय-सी प्रिय की हँसी ठिठोली|
कांश के पुष्प ऐसे थे जैसे,
दादी के धवलित केश रे
कैसा पिछड़ा देश रे,
कैसा विखरा देश रे|
गीतकार
दुर्गेश कुमार सराठे
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