न जाने कहाँ गुम हो गए
न जाने कहाँ गुम हो गए हो तुम,
उस दिन के बाद दिखे नहीं हो तुम|
दोस्त ऐसे न जाना था तुम्हें,
जाने से पहले बता तो देते हमें|
जब भी तुम्हें हम याद करते हैं,
न जाने क्यो खुद को बढ़ा मतलबी समझते हैं|
जब भी एकांत मिला करता है,
तब नाम तुम्हारा रटते हैं|
पहले तो सपने में देखा करते थे,
पर अब तो नींद से भी डरते हैं|
न जाने कहाँ उड़ गया नींद का पंछी,
जिसे देख तुम्हें याद किया करते थे|
जब भी तुम्हें भूलना चाहा हमने,
उतना ही घेरा तुम्हारे जाने के गम ने|
यार तुम्हे भुलाने की लाखों कोशिश की हमनें,
पर न जाने मेरे उर में कैसा राज जमाया तुमने|
जब मुझे नर्मदा की निर्मल धार दिखेगी,
तब-तब नर्मदा के उस जल में
ए दोस्त छवि तुम्हारी उकरेगी|
चाहे नयन हमारे पाहन हो जाएं,
पर उनमे केवल छवि तुम्हारी निखरेगी|
गीतकार
दुर्गेश कुमार सराठे
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