फागुन और फरवरी
फ़रवरी का महीना प्रारंभ होते ही, बसंत ऋतु के आगमन का आभास होने लगता है। प्रकृति में परिवर्तन होने का कार्य प्रारंभ हो जाता है। कुछ परिवर्तन तो होने भी लगते हैं,उनका अहसास भी होने ही लगा है। वातावरण मधुरता ग्राही हो गया है। एक उत्साहित करने वाली बयार की झंकार कर्णो को स्पष्ट सुनाई देने लगी है। पूरी प्रकृति हिलोरे लेने में व्यस्त है। किंतु ठंड का कहर अब भी क्षीण नहीं हुआ है। लगता है,वह फरवरी को त्रस्त करने के बाद ही विदा लेगी। बड़ी विडंबना है। धूप में बैठो तो शरीर पसीने से तर हो जाता है,और छाया कँप-कँपी पैदा कर देती है। प्रकृति अद्भभुत मज़किया रंग में रंगी है। हो भी क्यों ना,फागुन का आगमन जो होना है। वह तो हमारी प्रकृति के लिए विनोद का आश्रय स्थल है,जहां प्रकृति धूल से होली खेलती है।विविध रंगो के पुष्पों से सिंगार धारण कर लेती है। बिल्कुल सज-धज कर विनोद करती है। नवविवाहिता की भाँति,पूरे फागुन भर अपनी क्रियाकलापों से धमा चौकड़ी मचाये रहती है। अपने पराए का तो मानो उसमें कोई भाव ही नहीं,वह किसी को पराया नहीं मानती। सब पर धूल डालती है,रंगों की बौछार कर देती है। मानो संदेश दे रही हो। सभी जन,पशु,पक्षी,पेड़-पौधे,कीट सारा जगत,एक ही परिवार के सदस्य है। और उनके मध्य मुख्य संरक्षक प्रकृति,जो फगुनिया गई है। अपने पूरे स्वभाव में आ गई है। कुछ भी कहें,पर फागुन होता बहुत रसपूर्ण है। और हो भी क्यों ना ,वर्ष का सबसे छोटा पुत्र जो है। छोटे हमेशा लाड़ले होते हैं। यही कारण है,कि फागुन विनोद से ज्यादा परिपूर्ण होता है। अब सबका लाडला जो है। और फिर हम प्रारंभ ही मंगलयाचना से करते रहे हैं,और अंत भी उसी मंगलाचार के साथ ही करने का चलन रहा है। किंतु,अभी फ़रवरी का महीना चल रहा है। फागुन का इंतजार अभी बांकी है। फ़रवरी का फागुन के साथ क्या द्वंद हो सकता है,भला। जहां फागुन अपने स्वभाव से ही कुशल विनोदी स्वभाव वाला है। वहीं फ़रवरी बेचारा अपने ऊँटपटांग क्रियाकलापों के कारण,मुंह लटकाए हमेशा हेय भाव लिए फिरता रहता है। किंतु फिर भी आधुनिक दौर में फ़रवरी को श्रेष्ठ दिखाने का पूरा प्रयास अंधानुकरणीय महापुरुषों द्वारा किया जाता है। इसके लिए पूरा तर्कशास्त्र ही गढ़ डाला गया है। पर भटकचरिया कितने ही गुणों से परिपूर्ण ही क्यों ना हो किंतु हमेशा जन-मन मन की प्रिय नहीं हो पाई है। यही हालात फ़रवरी के है,बेचारा कुछ हृदयपीड़ित लोगों के उपयोग ही आ पाता है। लेकिन फागुन तो फागुन है। उसके साथ यह बंधन बिलकुल नहीं है। वह तो गुड़ ही है। कहां बच्चा,कहां बूढ़ा,कहां औरत,कहां पुरुष,यहां तक की पेड़-पौधे,पशु-पक्षी सारा जीव जगत फागुन के साथ हर्ष-उल्लास में डूब जाता है। फ़रवरी बेचारा एक सप्ताह तक खुशियों में उतरने का प्रयास करता तो है। पर कई बार दुःखों के नाले में नहा कर रो पड़ता है। मगर फागुन के साथ यह विषपांस ही नहीं है। वह हर्ष के साथ आता है। आम की डालियों से झूलता है। कोयल के साथ प्रेम के गीत गाता है। सरसों से अठखेलियां करता है। बेर के फल चखता है,बसंत से मिलता है,भौंरों को चूमता है और सर्वत्र रसोन्मादता सींच डालता है। प्रारंभ भी उसका हर्ष से परिपूर्ण है,और अंत भी इसी तरह,मध्य की तो बात ही अलग है। सारे जगत को स्त्री पुरुष के पूरक होने का ज्ञान यूं ही दे देता है। शिव का अर्धनारीश्वर रूप दिखाकर। फागुन नारी को पुरुष का आधा अंग मानता है। और फ़रवरी,उसके लिए क्या कहूँ? वह तो आप जानते ही हैं। बेचारा गुलाब खोजता फिरता है। मृगतृष्णा सा इधर-उधर नजरें उचकाते हुए.. उचक्का कहीं का।
अब सत्यता का ज्ञान कौन कराये? इस बावलेे को। जिसे वह खोजता है,वह तो अनुभव की बात है। उसे खोजा नहीं जा सकता। यूँ भटक भटक कर। वह तो महुुआ के पुष्प सा है,जो टपक पड़ता शांत बयार का निश्छल आँचल पाकर। उसे खोजा नहीं जा सकता। वह स्वतंत्र ही नहीं अपितु स्वछंद भी है।
किंतु हमारे फागुन के साथ ऐसा नहीं है। वह तो सत्यता से परिचित है। इसलिए वह सब को रंगना चाहता है।उसके प्रेम की व्याख्या सहज नहीं है। वह तो प्रेम को बांटता है। यूँ खोजता नहीं है। और सारी बुराइयों को होलिका में दहन कर देता है। फिर सबको गले लगा लेता है,रंग बिखेर कर। उसका कोई पराया नहीं होता,वह सब का है,सब उसके। पर उसे अपनी श्रेष्ठता का तनिक भी घमंड नहीं। वह तो अपनी मस्ती में मस्त है। उसमें त्याग है,समर्पण है। कदाचित यही कारण है कि वह जाते-जाते अपने हिस्से के पाँच दिन चैत को उधार देकर जाता है। ताकि चैत भी पाँच दिन हर्षोल्लास से काट सके। अब बेचारा चैत वर्ष का ज्येष्ठ पुत्र जो है। उसके कंधों पर भार भी अधिक है। वह तप से परिपूर्ण है पूरे साल का प्रबंधन उस पर ही तो लदा है। इसलिए फागुन अपने ज्येष्ठ भ्राता को अपने हिस्से की कुछ खुशियाँ देकर जाता है। फागुन केवल विनोद करना ही नहीं जानता। अपितु त्याग करना भी जानता है। और हमें कुछ ना कुछ देकर ही जाता है,लेता है तो,बस ,बुराइयां और उन्हें भी होली में दहन कर देता है। ऐसा है हमारा फागुन..।
बहुत सुन्दर रचना
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार
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