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समय समय की बात है

वर्तमान समय में जिस तरह पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण कर रहे हैं, वह एक दिन मानव को केवस हाड़ माँस का पुतला बनाकर ही छोड़ेगी| और कुछ को तो बना भी दिया है| इसके कुछ उदाहरण हमा...

पाती

आज जब मैं वर्तमान को देखता हूं तो बहुत ही मधुर फल मेरे नव प्रयाण के मार्ग में स्नेहा वादक बनकर प्रेम पाहन हो राह रोकने लगते हैं यह क्रिया शायद हर सरल हृदई व्यक्ति के साथ होती ...

प्रेमालय

तुमसे मिलने को आतुर हो, त्व नयनों को पढ़ने आया हूँ| कुछ शब्दों के मोती लेकर, प्रेमालय  गढ़ने  आया  हूँ| जहाँ ना कोई पूजालय है, ना दीपक है ना बाती| प्रेम हृदय में बसा रखा है, उसकी ज...

सूख चुके कुम्हलाये मन में

सूख चुके कुम्हलाये मन में, कैंसे अब तरूणाई आये| लहू लुहान हो वक्ष हृदय का, फिर कैंसे करूणाई छाये| दीपशिखा के जलते मन में, ढूब गया नवतारा| किरणपुंज को आहत करके, नाच रहा अंधयारा| ...

कविता

बढ़ी तपन है जीवन वन में, सूख गई कोमल फुलवारी| इच्छाएं हर पल मरती जाती, मची    हुई   है   मारा-मारी| पुष्प हुए अब छलिये सारे, उर के भीतर भरा कपट है| मानवता का ह्रास हुआ है, नैतिकता ...

कविता

अन मना सा मन हुआ क्यों? किसने दिल पर चोट जड़ी| चाँद  धरा  पर  आते-आते, तुम  पर  कैंसे  ओट  पड़ी? कहो ना कुछ तो मन के भँवरे, किन   पुष्पों  ने  घात किया? हृदय   भीतर   तीर चलाया, उरवन   में   उत्पात   किया? ऐसे डर कर चुप से क्यों हो? खिले खिले से रहने वाले| मौन औढ़ कर क्यों बैठो हो? पल पल में कुछ कहने वाले| हँसते खिलते से अधरों पर, मौनी  भूषण  नहीं सजाते| वन उपवन के रहने वाले, गमलों में कभी ना रह पाते| सजल सुनों तुम मन की पीड़ा, लैकिन  बिखर नहीं जाना| जितना किस्मत तुम्हें सताये, उतना तुम्हें निखर कर आना| दुर्गेश कुमार सराठे सजल

बैचैन बहुत हूँ

कविता बैचैन बहुत हूँ, दिल घबराया है| लगता है मन के ऊपर, घोर तिमिर का साया है| अंधकार डसने को आतुर, पुंज हृदय का खोया है| घोर निराशा जागी जागी, आशा का सूरज सोया है| नींद माँगते नयन ह...