Posts

कविता

बढ़ी तपन है जीवन वन में, सूख गई कोमल फुलवारी| इच्छाएं हर पल मरती जाती, मची    हुई   है   मारा-मारी| पुष्प हुए अब छलिये सारे, उर के भीतर भरा कपट है| मानवता का ह्रास हुआ है, नैतिकता ...

कविता

अन मना सा मन हुआ क्यों? किसने दिल पर चोट जड़ी| चाँद  धरा  पर  आते-आते, तुम  पर  कैंसे  ओट  पड़ी? कहो ना कुछ तो मन के भँवरे, किन   पुष्पों  ने  घात किया? हृदय   भीतर   तीर चलाया, उरवन   में   उत्पात   किया? ऐसे डर कर चुप से क्यों हो? खिले खिले से रहने वाले| मौन औढ़ कर क्यों बैठो हो? पल पल में कुछ कहने वाले| हँसते खिलते से अधरों पर, मौनी  भूषण  नहीं सजाते| वन उपवन के रहने वाले, गमलों में कभी ना रह पाते| सजल सुनों तुम मन की पीड़ा, लैकिन  बिखर नहीं जाना| जितना किस्मत तुम्हें सताये, उतना तुम्हें निखर कर आना| दुर्गेश कुमार सराठे सजल

बैचैन बहुत हूँ

कविता बैचैन बहुत हूँ, दिल घबराया है| लगता है मन के ऊपर, घोर तिमिर का साया है| अंधकार डसने को आतुर, पुंज हृदय का खोया है| घोर निराशा जागी जागी, आशा का सूरज सोया है| नींद माँगते नयन ह...

बसंत सुनो तो

अरे बसंत,.. सुनो जरा़......| क्या? मानव की छाया पड़ गई, तुम पर| जो तुम भी, भर उठे, धूर्तता से लबालब| करने लगे हो, छल| हाड़ माँस के पुतले जैंसे| या फिर, बदल गया स्वभाव तुम्हारा| कुछ तो बात है| अब कह भी दो,यार| या फिर समझ लें हम ही| पतझड़ तो दिखा था| तुम ही नहीं दिख रहे आजकल| शब्द खोजते हैं, अकुला कर| आँखे  अलसा गई हैं| राह जोहते जोहते| तितलियों को भी, शिकायत है तुमसे| भँवरे रो रहे हैं| तुम्हें ना पाकर| सारा उपवन,तड़प रहा है| गले लगाने तुमको| कलम मचल रही है, तुमसे लिपटने| दोस्त, कुछ तो लिहाज रखो| दोस्ती की.......| दुर्गेश कुमार सजल

भौत कछु डूबो डरो कल्ल की रात में

कविता रो परी आज, भुन्सारे भुन्सारे...... दिनूगो तो हो गओ| मनों भौत कछु डूबो डरो है| कल्ल की रात में| चिरैयों की चीं चीं.. भैरानी-भैरानी फिरत है| सूरज विचारो..... डुकरिया के पल्ले में, मो ल...

पैर का जूता

आज एक सज्जन को जूते हाथ में लिये देखा तब सोचा आखिर जूता भी कोई हाथ में रखने की चीज है| लगता है सनक गया है| या दिमाग खराब है इसका,जो जूते हाथ में लेकर घूम रहा है| अब जूते हाथ में लिए ह...

कविता

स्वासें भी अब टूट रहीं हैं, पता नहीं क्या होगा कल? कलियाँ देखो भँवरे संग में, धोखा  देतीं  करतीं  छल| भले दाग हैं उसमें लैकिन, फैंक  ना  पाये प्रेमी रज| बिना प्रेम की बैशाखी के, ...