अरे बसंत,.. सुनो जरा़......| क्या? मानव की छाया पड़ गई, तुम पर| जो तुम भी, भर उठे, धूर्तता से लबालब| करने लगे हो, छल| हाड़ माँस के पुतले जैंसे| या फिर, बदल गया स्वभाव तुम्हारा| कुछ तो बात है| अब कह भी दो,यार| या फिर समझ लें हम ही| पतझड़ तो दिखा था| तुम ही नहीं दिख रहे आजकल| शब्द खोजते हैं, अकुला कर| आँखे अलसा गई हैं| राह जोहते जोहते| तितलियों को भी, शिकायत है तुमसे| भँवरे रो रहे हैं| तुम्हें ना पाकर| सारा उपवन,तड़प रहा है| गले लगाने तुमको| कलम मचल रही है, तुमसे लिपटने| दोस्त, कुछ तो लिहाज रखो| दोस्ती की.......| दुर्गेश कुमार सजल