मृत्यु से सामना

कल जब मेरे साथ एक दुर्घटना घटते घटते रह गई.. और मृत्यु से निकटता के साथ एक मिलन सा रहा.. सायद मेरे अपनों का आशीर्वाद था जिसके कारण में आज सही सलामत हूँ.... पर इस घटना से में बुरी तरह घबरा गया था और उसी घबराहट को मैंने कविता का रूप दे दिया....,जिससे मन का अवसाद दूर हो सके....

रूह काँप उठी..
मन की विचार श्रृंखला टूटी.
लगता था जैंसे किस्मत हो रूठी.
वंदन भी क्रंदन सा लगा...
जीवन की बगिया में झंझावात एक जगा
हृदय में चिन्तओं की घटा मचली
कल जब मौत मेरे निकट से निकली

मौत से केवल दो पल की दूरी
उसे ठुकराने की वह मजबूरी
होते होते रह गया जीवन मृत्यु का आलिंगन
केवल रहा नजदीक से मृत्यु का चुम्बन
इस जग के इस सागर में ज्वार सी आई
उस मृत्यु से लगा कि अब जीवन नाव ढही
कल जब मौत मेरे निकट से निकली...

एक पल के लिए लगा आज तो अंतिम दिन है
सायद मृत्यु का यह आगमन है
लगा कि सांसे अब रुकने को हैं
जीवन मृत्यु के आगे झुकने को है
लैकिन उसने मुझे छुआ और चली
मैं स्थम्भित था पर मची हुई थी खलबली
कल जब मौत मेरे निकट से निकली....

दुर्गेश कुमार सराठे

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