जब सब कुछ छोड़ चला जाऊंगा

जब वाणी मौन औढ़ लेगी
जिह्वा हिल ना पायेगी
उर की धड़कन मद्धम होगी
सांसो की बेल उखड़ जायेगी
जीवन मुझे थका देगा
तब मृत्यु माँ मुझे सुलाने आयेगी
फिर क्या मुझे कोई याद करेगा
जब सब कुछ छोड़ चला जाऊंगा

मित्र ना मेरे पास में होंगे
ना जाने मैं वह कहाँ रहेंगे
जीवन से जब बिछुड़न होगा
अगला जनम सायद ही होगा
मृत्यु की खटक उर द्वारे पर
जाने कब कौंध मचा देगी
जग के इस सागर में मृत्यु
कभी भी जीवन नाँव डुबा देगी
जब मैं डूब रहा होऊंगा
क्या मुझे कोई बचाने आयेगा
जब दुर्गेश सब कुछ छोड़ चला जायेगा

तब केवल शब्द बचेंगें
शब्द ही मेरे जगत नचेंगे
शब्दों में मेरा नाम रहेगा
सारे जग में शब्द कहेगा
जब दुनिया भूल चुकी होगी
तब शब्द मुझे याद करेगा
क्या मुझे मेरे दोस्त याद करेंगे
या दुश्मन स्मृति में लायेगा
जब इस जग से एक दिन
दुर्गेश चला जायेगा

केवल महीने दो महीने तक याद रहूँगा
फिर दुनिया मुझे भुला देगी
मात-पिता बस याद करेंगे बर्षों
दोस्त भुला देंगे कल या पर्सों
केवल महीने दो महीने
मेरे अपनों की आँखों से
अश्रु की एक धार वहेगी
उस दिन सब नष्ट हो जायेगा
जब चिता मेरी सुलेगी
तब क्या मेरे संग कोई आयेगा
जब दुर्गेश जग को छोड़ चला जायेगा

दुर्गेश कुमार सराठे

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